Monday, March 20, 2017

क्या मज़दूरों को व्यवस्था से कोई उम्मीद नहीं रखनी चाहिए?

(दो जून 2015 को तहलका में प्रकाशित हुई विकास कुमार की ये रिपोर्ट 2012 को मानेसर के मारुति प्लांट में हुई घटना के बाद जेल में बंद 148 मज़दूरों की कहानी का एक पक्ष उजागर करती है. अब जबकि 31 मज़दूरों को दोषी क़रार दे दिया गया है औ उनमें से 13 को आजीवन कारावास दे दिया गया है और बाकियो ंको चार से दस साल की सज़ा सुनाई गई है, ये लेख फिर से प्रासंगिक हो गया है. सं.)
सात मई की दोपहर दिल्ली के विवेक विहार में रहने वाले 55 वर्षीय शिव प्रसाद गुड़गांव के जिला एवं सत्र न्यायालय में आए हैं. मई की इस तपती दोपहरी में शिव प्रसाद पिछलेदो घंटे से चहलकदमी कर रहे हैं. वो समय रहते अपने बेटे का ‘बेल बॉन्ड’ भर लेना चाहते हैं ताकि उसे जेल से निकालकर घर ले जा सकें. शिव प्रसाद का 25 वर्षीय बेटा प्रदीप कुमार पिछले ढाई साल से जेल में बंद है. एक दिन पहले ही उसे जमानत मिली है. आज सुबह जब शिव प्रसाद घर से अदालत के लिए निकल रहे थे तो उनकी पत्नी ने उनसे कहा कि आज बेटे को घर लेकर ही आना. शिव प्रसाद कहते हैं, ‘क्या कहें ये ढाई साल कैसे बीते हैं. जवान बेटा जेल में था. आज-कल करते-करते ये ढाई साल निकल गए. जब कभी भी राकेश की मां को मिलने-मिलवाने के लिए लाया वो केवल रोई. घर पर भी उसके दिन और रात रोते-रोते ही बीते हैं. अगर आज लड़का घर जाएगा तो सबको सालों बाद थोड़ी खुशी मिलेगी.’
 प्रदीप उन 148 मजदूरों में से एक हैं जो जुलाई 2012 में मारुति के हरियाणा स्थित मानेसर इकाई में मजदूरों और प्रबंधन के बीच हुई झड़प के बाद गिरफ्तार किए गए थे. इस घटना में कंपनी के महाप्रबंधक (एचआर) अवनीश कुमार देव की जलने से मौत हो गई थी.
मामले में पुलिस ने मारुति के मानेसर इकाई से जुड़े 148 मजदूरों पर आईपीसी की धारा 302 (हत्या), 307 (हत्या करने का प्रयास करना), 147 (दंगा करना), 353 (सरकारी काम में बाधा पहुंचाना), 436 (आग लगाना) और 120बी (साजिश करना) के तहत मामला दर्ज किया और सभी आरोपित मजदूरों को अगले कुछ दिनों में गिरफ्तार भी कर लिया.
‘तहलका’ ने मार्च 2014 में इस मामले पर ‘मजबूर मजदूर’ नाम से रिपोर्ट प्रकाशित की थी. तब मजदूरों की तरफ से गुड़गांव के जिला एवं सत्र न्यायालय में मामले की पैरवी कर रहे वरिष्ठ वकील रघुवीर सिंह हुड्डा ने पुलिस के चार्जशीट पर सवाल खड़े किए थे. उन्होंने चार्जशीट के जिस हिस्से पर सवाल खड़े किए थे उसमें चार चश्मदीद गवाहों के बयान दर्ज हैं. गवाह नंबर 9 ने अपने बयान में कुल 25 मजदूरों के नाम लिए हैं जिनके नाम अंग्रेजी के अक्षर ‘ए’ से ‘जी’ तक हैं. गवाह नं.10 ने भी अपने बयान में गिनकर 25 मजदूरों को ही देखने की बात स्वीकारी है. इनके नाम क्रम से अंग्रेजी के अक्षर ‘जी’ से ‘पी’ तक हैं. गवाह नंबर 11 ने जिन 25 मजदूरों के नाम लिए हैं वे अंग्रेजी के ‘पी’ से ‘एस’ तक हैं. गवाह नंबर 12 ने अपने बयान में 14 मजदूरों के नाम लिए हैं और ये नाम अंग्रेजी के ‘एस’ से ‘वाई’ तक हैं. इसके अलावा इन सभी चार गवाहों के बयान बिल्कुल एक जैसे ही हैं. जैसे कि इन सभी गवाहों ने अपने बयान के अंत में कहा है कि इनके अलावा और तीन-चार सौ मजदूर थे जो अपने हाथ में डोरबीम लिए हुए कंपनी के बाहर चले गए थे और मैंने बड़ी मुश्किल से अपनी जान बचाई.
पुलिस द्वारा अदालत में दाखिल की गई इस चार्जशीट को दिखाते हुए रघुवीर सिंह ने कहा था कि पहली ही नजर में यह साफ जान पड़ता है कि ये सारे बयान किसी एक ही आदमी ने लिखे हैं और इनमें जो नाम लिखे गए हैं वो कंपनी के किसी रजिस्टर से देखकर लिखे गए हैं.
आज, जुलाई 2012 की उस घटना को तीन साल होने वाले हैं. मामला अदालत में है और फिलहाल 114 आरोपित मजदूर जमानत पर रिहा हो चुके हैं, 34 मजदूर अब भी जेल में हैं. हालांकि जिन्हें जमानत मिली उन्हें भी इसके लिए कम से कम दो साल तीन महीने का इंतजार करना ही पड़ा.
इस मामले में पहली दफा फरवरी 2015 में दो मजदूरों को सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिली थी और उसके बाद ही बाकी 112 को जमानत मिलना संभव हो पाया. इस साल फरवरी में जिन दो मजदूरों को सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिली उनकी याचिका गुड़गांव के जिला एवं सत्र न्यायलय से तीन बार खारिज हो चुकी थी और चंडीगढ़ हाईकोर्ट से दो बार. चंडीगढ़ हाईकोर्ट के जज केसी पुरी ने मई 2013 में इन दो मजदूरों की जमानत याचिका को पहली बार खारिज करते हुए कहा था, ‘इस घटना की वजह से भारत की छवि दुनिया भर में खराब हुई है. विदेशी निवेशकों में गलत संदेश गया है. संभव है कि विदेशी निवेशक, मजदूर वर्ग में व्याप्त रोष की वजह से भारत में पूंजी निवेश न करें.’
चंडीगढ़ हाईकोर्ट द्वारा जमानत याचिका खारिज होने के बाद इन दो मजदूरों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. सुप्रीम कोर्ट ने 17 फरवरी 2014 को यह कहते हुए इनकी याचिका खारिज कर दी कि पहले मामले के चश्मदीद गवाहों के बयान निचली अदालत में दर्ज हो जाएं, इसके बाद जमानत पर विचार किया जाएगा. साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने जिला एवं सत्र न्यायालय गुड़गांव को निर्देश दिया कि 30 अप्रैल 2014 तक इस केस के चश्मदीद गवाहों के बयान अदालत में दर्ज करा लिए जाएं लेकिन ऐसा हुआ नहीं. बाद में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय की गई समयसीमा के बाद चश्मदीद गवाहों के बयान अदालत में दर्ज हुए. गवाहों ने अदालत में इन दो मजदूरों की गलत पहचान की.
इस आधार पर इन लोगों ने एक बार फिर जमानत के लिए चंडीगढ़ हाईकोर्ट से गुहार लगाई लेकिन 23 दिसंबर 2014 को हाईकोर्ट ने एक बार फिर इन्हें जमानत देने से मना कर दिया. जमानत याचिका खारिज करते हुए कोर्ट ने यह तो माना कि इन्हें जमानत दी जानी चाहिए लेकिन साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा कि इन लोगों को इसके लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगानी चाहिए. चंडीगढ़ हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद मजदूरों ने दोबारा से सुप्रीम कोर्ट में जमानत याचिका दाखिल की और आखिरकार यहां से इन्हें 20 फरवरी 2015 को राहत मिली. इन दो मजदूरों को इनकी गिरफ्तारी के लगभग 31 महीने बाद जमानत मिली और ये जेल से बाहर आ पाए. इसके बाद मार्च 2015 में 77 और आरोपित मजदूरों को गुड़गांव के जिला एवं सत्र न्यायालय से जमानत मिली. कुल मिलाकर अब 114 आरोपित मजदूर जमानत पर बाहर हैं. ऐसे में सवाल यह उठता है कि इन्हें जमानत मिलने में ही इतना वक्त क्यों और कैसे लग गया? जबकि कई मौकों पर सुप्रीम कोर्ट खुद ही यह मान चुका है कि देश की अदालतों को ‘जेल नहीं बेल’ की थ्योरी के तहत काम करना चाहिए. हम ये सवाल देश की जानी-मानी वकील वृंदा ग्रोवर के सामने रखते हैं. वृंदा इस मामले में मजदूरों की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में पैरवी कर रही हैं. सवालों के जवाब में वृंदा कहती हैं, ‘मैं खुद नहीं समझ पा रही हूं कि जमानत मिलने में इतना समय कैसे लग गया. जबकि कानूनी तौर पर ये केस बहुत कमजोर है. जुलाई में इस मामले की अंतिम सुनवाई होनी है और अब तक 34 मजदूर जेल में हैं.’ वहीं गुड़गांव जिला एवं सत्र न्यायालय में मजदूरों की तरफ से पैरवी कर रहे वकील मोनू कुहाड़ का मानना है कि यह मामला कभी कानूनी था ही नहीं. मोनू कहते हैं, ‘जब हम इस मामले को कानून के दायरे से बाहर जाकर समझते हैं तो काफी कुछ साफ होता है. गुड़गांव में करीब-करीब 12 लाख मजदूर और कर्मचारी हैं जो कई अलग-अलग निजी कंपनियों में काम कर रहे हैं और समय-समय पर अपनी मांगों के लिए प्रबंधन पर दबाव बनाते रहते हैं. इस केस के हवाले से इन लाखों कर्मचारियों को एक संदेश देने की कोशिश की गई है कि अगर तुमने अपनी यूनियन बनानी चाही तो तुम्हें भी मारुति के मजदूरों की तरह बिना किसी खास सबूत और गवाह के दो-ढाई साल तक जेल में सड़ा दिया जाएगा. तुम्हारी नौकरी चली जाएगी और परिवार बिखर जाएगा.’
मोनू आगे बताते हैं, ‘इस केस में 148 मजदूर पिछले दो-ढाई साल से जेल में थे लेकिन जब हम इस केस को पढ़ते हैं तो पाते हैं कि केवल 10-15 मजदूर ऐसे हैं जिनके खिलाफ कुछ सबूत हैं वो भी इतने पुख्ता नहीं हैं कि उन पर हत्या का मामला साबित हो सके. इस केस में 102 गवाह थे और सबकी गवाही अदालत में हो चुकी है. 148 आरोपित मजदूरों में से 16 ऐसे हैं जिनके खिलाफ एक भी गवाह अदालत में नहीं आया. 98 ऐसे आरोपित मजदूर हैं जिनके खिलाफ गवाह तो आए लेकिन किसी भी गवाह ने इनकी पहचान नहीं की. ये लोग जिन्हें अभी जमानत मिली है वो पहली फुर्सत में बरी किए जाने चाहिए थे. क्योंकि इनके खिलाफ कोई सबूत ही नहीं है, कोई गवाह ही नहीं है.’
मोनू बात करते हुए कुछ सवाल उठाते हैं और इन सवालों के जवाब भी वो खुद ही देते हैं. वो कहते हैं, ‘जिनके खिलाफ कोई सबूत या गवाह नहीं है उस पर मुकदमा कैसे चल सकता है? इन्हें जेल में कैसे रखा जा सकता है? लेकिन सच्चाई ये है कि ये सालों तक जेल में रहे हैं और अब जमानत पर बाहर आए हैं. अब इससे तो यही समझ आता है कि सरकार और व्यवस्था इन मजदूरों के बहाने बाकी लाखों मजदूरों को एक सबक देना चाहती थी. जिसमें वो कामयाब रही.’
इस बारे में बात करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण से संपर्क करते हैं तो वह साफ शब्दों में न्यायपालिका और सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हैं. वो कहते हैं, ‘जमानत की पूरी प्रक्रिया ही मनमानी है. अदालतें जिसे चाहें जमानत दें और जिसे चाहें, न दें. हमारी अदालतों में वर्ग भेद भी बहुत है, यही कारण है कि पढ़े-लिखे और पैसे वाले व्यक्ति को तुरंत जमानत मिल जाती है लेकिन निचले तबके को जमानत के लिए सालों चक्कर लगाने पड़ते हैं.  सरकारों की मंशा भी अदालतों को प्रभावित करती है. सरकार जिसे दबाना चाहती है, अदालत उसे जमानत नहीं देती है.’
इस पूरे प्रकरण से जुड़ा एक और तथ्य है जिसे नजरअंदाज करके आगे नहीं बढ़ा जा सकता. जिस वक्त यह घटना हुई थी उस वक्त हरियाणा में कांग्रेस का शासन था और भूपेंद्र सिंह हुड्डा राज्य के मुख्यमंत्री थे. तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील केटीएस तुलसी को स्पेशल पब्लिक प्रॉसिक्यूटर नियुक्त किया. आरटीआई से मिली एक जानकारी के मुताबिक तत्कालीन हरियाणा सरकार ने केटीएस तुलसी को हर पेशी के लिए 11 लाख रुपये फीस दी. तुलसी के तीन सहायकों को एक पेशी के लिए 66,000 रुपये मिलते थे. दो साल में मारुति केस में भूपिंदर सिंह हुड्डा सरकार ने केटीएस तुलसी को 5 करोड़ रुपये बतौर फीस दिए थे. पिछले साल राज्य में सत्ता परिवर्तन हुआ. भाजपा के नेतृत्व में सरकार बनी और मनोहर लाल खट्टर राज्य में मुख्यमंत्री बने. भाजपा सरकार ने पिछले साल दिसंबर में केटीएस तुलसी को इस केस से अलग कर दिया. इस मामले में हरियाणा की मौजूदा सरकार का पक्ष जानने के लिए हमने खट्टर सरकार के  श्रम और रोजगार मंत्री कैप्टन अभिमन्यु से संपर्क किया लेकिन उनकी तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिल सकी.
इस कानूनी लड़ाई में एक पक्ष उन परिवारों का भी है जिनके लड़के इस मामले में सालों से जेल में बंद हैं या सालों बाद जमानत पर रिहा हुए हैं. जिन परिवारों के लड़के अभी तक जेल में बंद हैं वो जल्दी ही उनके जेल से छूटने की उम्मीद लगाए हुए हैं और इसी सहारे अपना जीवन जी रहे हैं. वहीं जिन परिवारों के बच्चे जमानत पर बाहर आ चुके हैं वो ठगा-सा महसूस करते हैं. उन्हें इस बात की खुशी तो है कि उनका लड़का जेल से बाहर आ गया लेकिन इनके मन में यह सवाल भी है कि इतने समय बाद क्यों? जब ‘तहलका’ ने ऐसे प्रभावित परिवारों से संपर्क किया तो कईयों ने बात करने से साफ मना कर दिया. कुछ लोगों का कहना था कि वो अब पिछली जिंदगी को याद नहीं करना चाहते और जो हुआ उसे भुलाकर भविष्य की तरफ देखने की कोशिश कर रहे हैं. वहीं कुछेक परिवारों ने मीडिया के प्रति अपनी नाराजगी का इजहार करते हुए बात करने से ही मना कर दिया.

Sunday, March 19, 2017

'अदालत, मीडिया किसी ने हमारा साथ नहीं दिया....'

(यह रिपोर्ट 2 जून 2015 में तहलका पत्रिका में प्रकाशित हुई थी. तबतक मज़दूरों को जेल में कैद रहते तीन साल हो चुके थे. उस समय एक मज़दूर की आपबीती को पत्रकार विकास कुमार ने बात की थी. सं.)
20 वर्षीय रमन विश्नोई हरियाणा के फतेहाबाद जिले के रहने वाले हैं. नवंबर 2011 में रमन ने मारुति के मानेसर प्लांट में बतौर प्रशिक्षु काम करना शुरू किया था. जुलाई 2012 की घटना के बाद पुलिस ने उन्हें भी उनके कमरे से गिरफ्तार किया और जेल में डाल दिया. अपनी गिरफ्तारी के पौने तीन साल बाद रमन इसी साल मई में जमानत पर रिहा हुए हैं.
रमन से हमारी मुलाकात गुड़गांव के जिला एवं सत्र न्यायलय में हुई. वो यहां पेशी के लिए आए हैं. कंधे पर बैग लटकाए रमन एक पल के लिए किसी कॉलेज के छात्र जान पड़ते हैं लेकिन ऐसा है नहीं. रमन पिछले कई सालों से जेल में थे और उनके मुताबिक वो बिना किसी गलती के जेल की सजा काटकर आए हैं. रमन अपनी आपबीती बताते हुए कहते हैं, ‘क्या कहेंहमारा जीवन तो बर्बाद ही हो गया समझिएहम तो पक्की नौकरी पर भी नहीं थेट्रेनी थेकल को अगर बेगुनाह साबित भी हो गए तो भी कुछ नहीं मिलेगाजो पक्की नौकरी पर थे वो तो केस-मुकदमा भी कर सकते हैं. हम क्या करेंगेहमें तो कल को कोई नौकरी पर भी नहीं रखेगाक्योंकि हम जेल में थे.
रमन के परिवार में उनके पिता हैं जो खेती-किसानी करते हैं, मां हैं और एक बहन है. उनका छोटा-सा परिवार अपने गांव में ही रहता है. जितने दिन रमन जेल में रहे उतने दिन उनके पिता फतेहाबाद और गुड़गांव कोर्ट के बीच चक्कर लगाते रहे. हर तारीख पर आना. हर कुछ दिन पर अपने बेटे से जेल में जाकर मिलना. कपड़े और दूसरे जरूरी सामान देना उनकी नियमित
दिनचर्या थी. रमन के अनुसार आज उनके पिता जी के माथे पर करीब-करीब पांच से सात लाख का कर्ज है. बहन की शादी के लिए जो थोड़े-बहुत पैसे थे वो भी उन्हें बाहर लाने में चले गए. फिलहाल रमन को इस बात का
डर है कि आगे उन्हें कोई काम नहीं देगा क्योंकि उन पर जेल काटकर आने का ठप्पा लग चुका है.
रमन इस सबके लिए पूरे सिस्टम और मीडिया को दोषी मानते हैं. रमन के मुताबिक उनके साथ वही हुआ जो अब तक वो केवल टीवी या सिनेमा में देखते रहे हैं. वो कहते हैं, ‘मेरे साथ जो हुआ है वैसा होते हुए मैंने आज तक केवल फिल्मों में ही देखा है. फिल्म की शुरुआत में पूरा सिस्टम एक साथ मिलकर हीरो और उसके परिवार को परेशान करता है. फिल्म के आखिर में हीरो पूरे सिस्टम को सबक सिखाता है. लेकिन यहां ऐसा नहीं है. मैं फिल्म का हीरो नहीं हूं और यहां सब कुछ असली है. वास्तव में पूरा सिस्टम भ्रष्ट है. पुलिस ने हमे बिना एफआईआर में नाम के जेल में डाल दिया और अदालतों ने दो-ढाई साल तक जमानत नहीं दीमीडिया ने भी हमारा साथ नहीं दियाऔर मैं कुछ नहीं कर सकता. मैं केवल अपनी जिंदगी को शुरू होने से पहले ही बर्बाद होते हुए देख सकता हूं.
मई की दोपहर में एक पेड़ के नीचे रमन विश्नोई हमसे ये सारी बातें एक सांस में कह गए. ऐसा महसूस होता है कि रमन ने जो कहा उसकी वजह से दिन का पारा सौ डिग्री के आसपास पहुंच गया है और इस आंच में सबकुछ धू-धूकर जल रहा है.

 तहलका से साभार

फिलिस्तीनी ऐक्टिविस्‍ट की शवयात्रा में उमड़ी जनता

10 दिन पहले इजरायली सेना ने वेस्ट बैंक में फिलिस्तीन के युवा एक्टिविस्ट बासिल अल अराज को गोलियों से छलनी कर दिया गया था। इतना ही नहीं उन्होंने 10 दिनों तक उसके शव को अराज के परिवार वालों को नहीं दिया। इसके खिलाफ पूरे फिलिस्तीन में जबरदस्त प्रदर्शन हुए। आखिरकार 19 मार्च को इजरायल ने उसके शव को सौंप दिया। जिस समय
अराज की शवयात्रा निकली ऐसा लगा जनता का सैलाब उमड़ पड़ा हो। मुक्ति संघर्ष के इस सेनानी को अंतिम विदाई देने के लिए मैं भी वहां था। भीड़ इतनी ज्यादा थी कि मैं उसके पार्थिव शरीर को बड़ी जद्दोजहद के बाद देख पाया। फिलिस्तीन के स्वास्‍थ्य मंत्रालय के मुताबिक अराज को 10 गोलियां मारी गई थीं, जबकि वह अहिंसावादी था और अहिंसात्मक ढंग से ही इजरायल की कब्जा करने की नीति का विरोध करता था। दो गोलियां तो उसके सिर में और दो सीने में मारी गई थीं। जाहिर है इसके बाद वह जिंदा नहीं रहा होगा। आप समझ सकते हैं, उसको मारने के बाद भी मारा गया। ओह इतनी क्रूरता कोई इंसान कैसे कर सकता है...इस समय मुझे मेल गिब्सन की प्रसिद्ध फिल्म ब्रेव हर्ट याद आ रही थी...बासिल ऐसा ही जांबाज था... शव यात्रा में मैंने देखा अराज के पिता अपने बेटे के शव को सॉल्यूट कर रहे थे। वहां मौजूद पत्रकारों के एक समूह से उन्होंने कहा कि वे खुद को बड़ा भाग्यशाली मान रहे हैं कि वे अराज को अंतिम विदाई दे पाए। एक युवा लड़की, जो कि संभवतः अराज की करीबी दोस्त थी ‌कब्रिस्तान के गेट के कोने में खड़ी फूट-फूट कर रो रही थी। वेस्ट बैंक के ‌कब्रिस्तान में अराज के शव का अंतिम संस्कार किया गया। अराज की शवयात्रा उसके पै‌तृक घर बेथलहेम के गांव अल वजाला से शुरू हुई। अभी अराज महज 31 साल का था। 6 मार्च को रमल्ला में इजरायली सेना के हमले में उसकी मौत हो गई थी। अराज फिलिस्तीन के मुक्ति संघर्ष का एक जांबाज योद्धा था। उसने इसके लिए फिलिस्तीन के युवाओं को संगठित करने का काम किया। उसके न रहने पर भी फिलिस्तीन के मुक्ति संघर्ष का कारवां नहीं रुकने वाला....‌बासिल अल अराज के करीबी साथी हमजा अकरावी कहते हैं बासिल के न रहने से फिलिस्तीन के इजरायल विरोधी शांतिपूर्ण युवा आंदोलन को बहुत बड़ी क्षति पहुंची है। लेकिन इसे खत्म नहीं किया जा सकता। जल्दी ही हम इस दुख से उबर जाएंगे। हालात हमें ठंडा होकर बैठने नहीं देते। इसलिए बासिल हमेशा हमें प्रेरणा देता रहेगा। (यह लेख फिलिस्तीन के मशहूर लेखकर मजीन कमसिएह का है। वे फिलिस्तीन म्यूजियम ऑफ नेचुरल हिस्ट्री के निदेशक, सामाजिक कार्यकर्ता, और इजरायल के खिलाफ फिलिस्तीनी जनता के संघर्ष पर कई किताबों के लेखक हैं।)

Saturday, March 18, 2017

मारुति के 13 मज़दूरों को आजीवन कारावास

18 मार्च को मारुति मजदूरों के केस में कोर्ट ने 31 मज़दूरों पर अपना फैसला देते हुए यूनियन प्रतिनिधियों व जीयालाल समेत 13 मज़दूरों को आजीवन कारावास और 14 को जेल में काटी गयी सज़ा में रिहा कर दिया है.                        
इसके अलावा प्रदीप गुर्जर, रामशब्द मौर्य, इकबाल व जोगिन्दर को 5 साल की सजा सुनाई गई है.
मज़दूरों ने कहा है कि वो इस फैसले के ख़िलाफ़ ऊपरी अदालत में जाएंगे और इसे चुनौती देंगे.

यूनियन नेताओं ने कहा है कि मारुति मज़दूरों के ख़िलाफ़ फैसले ने फिर साबित किया है की यह व्यवस्था पूँजीपतियों के हित में खड़ी है.



हालांकि 117 मज़दूरों के बेगुनाही का फैसला और 14 मज़दूरों की पूर्व जेलबंदी के आधार पर रिहाई को देशभर के मज़दूरों के एकताबद्ध विरोध संघर्ष की जीत बताया है.
गुड़गांव के मानेसर प्लांट में 2012 में हिंसा हुई थी जिसमें क़रीब डेढ़ सौ मज़दूरों को क़रीब क़रीब चार साल तक जेल में बंद रखा गया. 
सवाल उठता है कि जो 117 मज़दूर बेगुनाह क़रार दिए गए हैं उनके नष्ट हुए 4 साल का हिसाब कौन देगा. 
     (हुंडै के कर्मचारी लंच बहिष्कार में हिस्सा लेते हुए. फ़ोटो क्रेडिट मुकुल)
इस मुक़दमे में 10 मार्च को फैसला आया था जिसमें 31 लोगों को दोषी क़रार दिया गया था. 
इसके विरोध में गुड़गांव से लेकर देश के विभिन्न हिस्से के मज़दूरों ने होली न मानाने का ऐलान किया था.
इससे पहले 9 मार्च को मानेसर के मारुति के 4 प्लांटों व बेलेसोनिक सहित 6 कंपनियों के 25000 मज़दूरों ने लंच का बहिष्कार किया था. 

Sunday, March 12, 2017

मारुति संघर्ष: 37 मज़दूरों को दोषी करार दिया

117 लोगों को आरोपमुक्त किया
⁠⁠⁠                                                                                                                                                 मारूति मामले में
     आज कोर्ट का फैसला आ गया। 148 लोग जो जेल में थे , उनमें से 31 को दोषी करार दिया गया और 117 लोग जो जेल में चार साल की सजा भुगत चुके थे आरोपमुक्त कर दिया गया। 

31 में से 13 लोगों पर  ह्त्या, ह्त्या के प्रयास, आगजनी, षडयंत्र का आरोप तय हुआ। बाकि 18 पर मारपीट, चोट पहुंचाने और अनाधिकृत प्रवेश, जमघट लगाने का आरोप तय हुआ है।
31 दोषी मजदूरों में से 13 मज़दूरों राममेहर, संदीप ढिलों, राम विलास, सरबजीत, पवन कुमार, सोहन कुमार, अजमेर सिंह, सुरेश कुमार, अमरजीत, धनराज, योगेश, प्रदीप गुर्जर, जियालाल को 302, 307, 427,436, 323, 325, 341, 452, 201,120B जैसी धाराओं के अंतर्गत दोषी ठहराया गया है। इसमें मारूति यूनियन बॉडी मेम्बर सहित जियालाल शामिल हैं। 
दूसरी कैटेगरी में शामिल 14 लोगों को धारा 323,325,148,149,341,427 के तहत आरोपी ठहराया गया है।

    तीसरी कैटेगरी में शामिल 4 लोगों को धारा 323,425,452,  के तहत आरोपी ठहराया गया है। 
सभी आरोपियों को 17 मार्च को सजा सुनाई जायेगी।

    ये एक राजनीतिक फ़ैसला था जिसमें तथ्यों के परे जाकर सजा सुनाई गयी है। ये फ़ैसला पूंजीपतियों के पक्ष में ना सिर्फ 148 मारूति मजदूरों, 2500 परिवारों के ख़िलाफ़ है बल्कि पूरे मज़दूर वर्ग खासकर गुड़गांव से नीमराणा तक के औद्योगिक क्षेत्र के मज़दूरों के ख़िलाफ़ है। इस फ़ैसले से राज्य सत्ता न्याय वयवस्था का रूख स्पष्ट हो जाता है और सवाल उठता है कि मज़दूर आख़िर किस से न्याय की उम्मीद करें। क्या 13 यूनियन सदस्यों को इसलिए फंसाया गया, सजा दी गयी कि वे मज़दूरों का प्रतिनिधित्व कर रहे थे और मारूति मैनेजमैन्ट की आँख में खटक रहे थे।
     बचाव पक्ष की अधिवक्ता ने कहा कि माना मानेसर प्लांट के घटनाक्रम में एक व्यक्ति की जान गयी मगर इन 13 लोगों के ख़िलाफ़ बहुत कमज़ोर साक्ष्य है। जिन 117  मजदूरों को आज आरोपमुक्त घोषित किया गया, उन्होनें ने जो चार साल जेल में गुजारे उसका हिसाब कौन देगा, इसके लिए किसी को दोषी ठहराया जाएगा, क्या उनके चार साल कोई वापस लौटा सकता है। इनका दोष मुक्त साबित होना यह दिखाता है कि इनके नाम पूरे घटनाक्रम को दूसरा रूप देने के लिए, मज़दूरों के ख़िलाफ़ झूठा माहौल बनाने के लिए डाला गया था। अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर ने ये फैसला हाईकोर्ट में कहीं भी टिकने वाला नहीं है हम आगे इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ हाईकोर्ट में जाएंगे।
   
(अंग्रेज़ी अख़बार द हिंदू में 13 अक्टूबर 2016 को प्रकाशित मारुति मज़दूरों पर केंद्रित पन्ना)

कल जिस प्रकार से गुड़गांव से लेकर मानेसर तक जिस प्रकार से मजदूरों ने अपने साथियों के समर्थन में खाने का बहिष्कार कर अपनी एकजुटता और ताकत दिखायी वो प्रशासन और प्रबंधन के लिए आगे उठने वाले आंदोलन की एक झलक भर है। आज जिस प्रकार से गुड़गांव कोर्ट से लेकर मानेसर प्लांट तक कदम कदम पर पुलिस तैनात थी वो प्रशासन और प्रबंधन के मज़दूर विरोधी रूख को दर्शाता है। ये लोग मजदूरों के संगठन, उनकी एकजुटता से डरते हैं। आज मानेसर प्लांट के मजदूरों को काफी देर तक प्लांट के अंदर रोककर रखा गया।

     आज इस फ़ैसले के बाद कमला नेहरू पार्क, गुड़गांव में पुलिस की भारी मौजूदगी में  ट्रेड यूनियन की बैठक हुई। जिसमें सभी ने इस अन्यायपूर्ण फ़ैसले की एक स्वर से भर्त्सना की और इसके विरोध में बावल से लेकर गुड़गांव तक की सभी यूनियनों ने आगामी 16 मार्च को लंच बहिष्कार का फ़ैसला किया। साथ ही सब ने होली ना मनाने का फ़ैसला किया। आंदोलन की आगे की रणनीति तय करने के लिए आगामी 15 मार्च को देवीलाल पार्क में ट्रेड यूनियनों की बैठक है।
पूरी प्रक्रिया में जिस प्रकार से आरोप गठित हुए, सुनवाई चली वो न्याय व्यवस्था की जटिलता जिससे मजदूरों के फ़ैसले प्रभावित होते हैं को स्पष्ट तरीके से सामने लाती है।
सवाल यह है कि गुड़गांव से लेकर बावल तक का मज़दूर आंदोलन इस फ़ैसले से कितना प्रभावित होगा, आंदोलन आगे की रणनीति किस प्रकार तय करेगा.

-सुमित, मारुति आंदोलन में सक्रिय कार्यकर्ता 

Friday, December 9, 2016

नोटबंदी की आड़ में कर्मचारियों के पीएफ पर डाका

अभी नोटबंदी से केंद्र की मोदी सरकार उबर नहीं पाई लेकिन उसने पीएफ के मामले में नियमों में बड़ा बदलाव करते हुए पीएफ कटवाने की अनिवार्यता खत्म कर दी है। नए नियम के अनुसार, पीएफ कटवाना या न कटवाना कर्मचारियों की मर्जी पर निर्भर करेगा।
अब 15 हजार रुपए प्रति माह से कम वेतन पाने वाले कर्मचारी के पास अपना पीएफ कटवाने या न कटवाने का विकल्प होगा। यानी पीएफ कटवाना जरूरी नहीं होगा। श्रमिक संगठनों का कहना है कि ये कानून लाकर मोदी सरकार असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों की आर्थिक सुरक्षा घेरे को खत्म करने का काम किया है और सरकार धीरे धीरे पीएफ की व्यवस्था को कंपनियों की मर्जी के मुताबिक करने का रास्ता खोल दिया है।
उल्लेखनीय है कि पीएफ़ में जितने रुपये श्रमिक के वेतन से कटते हैं उतने ही रुपये सरकार मिलाती है और इस तरह मज़दूर की यही कुल जमा पूंजी होती है जिसे वो अपने मुसीबत के दिनों में इस्तेमाल करता है।  
पीएम नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में बैठक हुई थी और एपीएफ कानून का संशोधन किए बिना ही इस संदर्भ में नोटिस जारी कर दिया गया। नोटिस में कहा गया है कि रोजगार के अवसर बढ़ाने और एक्पोर्ट सेक्टर को मजबूत करने को ध्यान में रखते हुए यह कदम उठाया गया है। सूचना में कहा गया है कि लेबर कानूनों के आसान बनाने को ध्यान में रखते हुए यह बदलाव किया गया है। हालांकि यह बदलाव फिलहाल एक्सपोर्ट इंडस्ट्री के लिए लागू किया गया है। अन्य क्षेत्रों के लिए बाद में फैसला लिया जाएगा।
नोटिस में कहा गया है कि एक्सपोर्ट इंडस्ट्री में रोजगार के अवसर बढ़ाने और उसे मजबूत बनाने के उद्देश्य से नियमों में बदलाव किया गया है। इसके अलावा, श्रम से जुड़े कानूनों को आसान बनाने के लिए बदलाव किया गया है।
इससे पहले मजदूरों के प्राविडेंट फंड को निकालने को लेकर मोदी सरकार ने कड़े नियम बना दिए थे जिसके बाद बैंगलोर में मजदूरों का हिंसक प्रदर्शन हुआ और उसके बाद सरकार को ये आदेश वापस ले लेना पड़ा था।

Monday, August 25, 2014

मज़दूर हितों पर एक बड़ा हमला  

केन्द्रीय मंत्रीमण्डल ने पारित किया नया श्रमकानून


अभी विरोध के स्वर उठ भी नहीं सके थे कि नरेन्द्र मोदी सरकार ने मज़दूर आबादी पर बड़ा हमला बोल दिया है। केन्द्रीय मन्त्रीमण्डल ने आज ”अच्छे दिन“ के सौगात के तौर पर कार्पोरेट जगत के हित में श्रमकानूनों में बदलाव का प्रस्ताव पारित कर दिया। इसका मूल मंत्र है ‘‘हायर एण्ड फायर’’ यानी जब चाहो काम पर रखो, जब चाहो निकाल दो। फिलहाल फैक्ट्री अधिनियम-1948, श्रम विधि (विवरणी देने व रजिस्टर रखने से कतिपय स्थानों में छूट) अधिनियम-1988, अपरेण्टिस अधिनियम, 1961 में कुल 54 संशोधनों पारित हो गये।

यह मोदी सरकार का सबसे महत्वपूर्ण एजेण्डा था। राजस्थान की भाजपा सरकार पहले ही ऐसे कानून बना चुकी थी। उल्लेखनीय है कि केन्द्र सरकार द्वारा गुपचुप तरीके से 5 जून को फैक्ट्री अधिनियम-1948 में, 17 जून को न्यूनतम वेतन अधिनियम-1948, 23 जून को श्रम विधि (विवरणी देने व रजिस्टर रखने से कतिपय स्थानों में छूट) अधिनियम-1988 के साथ ही अपरेण्टिस अधिनियम-1961 व बाल श्रम (निषेध एवं नियमन) अधिनियम-1986 में भारी संशोधन का नोटिस जारी किया था।

यही नहीं, देश के महत्वपूर्ण ऑटो इण्डस्ट्री के क्षेत्र को आवश्यक सेवा में लाने का भी प्रस्ताव आ चुका है। ट्रेड यूनियन अधिनियम, 1926 व औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 में भी फेरबदल की तैयारी चल रही है। इस मज़दूर विरोधी कदम का देश के विभिन्न हिस्सों में विरोध भी हो रहा था। यही नहीं, देश की व्यापक मज़दूर आबादी को तो इसका इल्म तक नहीं था कि क्या होने जा रहा है। लेकिन सबको दरकिनार कर और मज़दूर वर्ग से बगैर सलाह-मशविरे के मोदी सरकार ने ये कारनामा कर दिया। अब तो महज संसद में इसे पारित होने की देर है और मज़दूरों को हलाल करने का कानून अस्तित्व में आ जाएगा।

 ”हायर एण्ड फायर“ की तर्ज पर होगा नया श्रमकानून

 प्रस्तावित संशोधनों में साफ तौर पर लिखा था कि ”इससे काम करने वालों और उद्योग दोनो को मुक्त माहौल मिले। ...इससे तुरंत नौकरी देने व तुरंत निकालने की समस्या दूर होगी।“ मतलब साफ है। प्रबन्धन को जब चाहे काम पर रखने और जब चाहे निकालने की खुली छूट होगी। नये कानून के तहत जिस कारखाने में 300 से कम मज़दूर होंगे उसकी बन्दी, लेआॅफ या छंटनी के लिए मालिकों को सरकार से इजाजत नहीं लेनी होगी। पहले यह 100 श्रमिकों से कम संख्या वाले कारखानों पर लागू था। वैसे भी आज ज्यादातर कारखानों की स्थिति यह है कि कम्पनी इम्पलाई बेहद कम रखे जाते हैं।
अधिकतर काम बेण्डरों से या ठेके पर करा लिया जाता है। मतलब यह कि मनमाने तौर पर छंटनी और कम्पनी बन्द करने का कानूनी रास्ता और खुल जाएगा। प्रस्तावों में उत्पादकता व कारोबार के कथित कमी पर मैन पाॅवर कम करने यानी मनमर्जी छंटनी की छूट भी होगी। बदले कानून में ठेका प्रथा को मान्यता मिल जाएगी। यहाँ तक कि ठेका कानून 20 कर्मकारों की जगह 50 कर्मकारों वाले संस्थानों में लागू करने की व्यवस्था है।
महिलाओं से कारखानों में प्रातः 6 बजे से सांय 7 बजे तक ही काम लेने में बदलाव के साथ उनसे नाइट शिफ्ट में भी काम लेने की छूट दी जा रही है। यही नहीं, कम्पनियों को तमाम निरीक्षणों से भी छूट देने, 10 से 40 कर्मकारों वाले कारखानों को इससे पूर्णतः मुक्त करने, कम्पनियों को श्रमविभाग या अन्य सरकारी विभागों में रिपार्ट देने में भी ढील होगी।
यही नहीं, अपरेण्टिस ऐक्ट-1961 में नया प्रावधान यह बन गया है कि प्रबन्धन चाहें जो अपराध करे उसे हिरासत में नही लिया जा सकेगा। ओवरटाइम के घण्टों में इजाफा करते हुए नये कानून के तहत विद्युत की कमी के बहाने मनमर्जी साप्ताहिक अवकाश बदलने, एक दिन में अधिकतम साढ़े दस घण्टे काम लेने को बारह घण्टा करने, किसी तिमाही में ओवरटाइम के घण्टों की संख्या 50 से बढ़ाकर 100 करने का फरमान है। वैसे भी अघोषित रूप से मनमाने ओवरटाइम की प्रथा चल रही है, जहाँ लगातार कई घण्टे खटाने के बावजूद कानूनन डबल ओवर टाइम देना लगभग खत्म हो चुका है। अब तो इसे कानूनी रूप भी मिल गया।

 बदलाव की और भी कोशिशें हैं जारी 

अभी तो ये बस शुरुआत है। यूनियन बनाने के नियम और कठोर करने का प्रावधान आ रहा है, जिसमें कम से कम 30 फीसदी कार्यरत श्रमिकों की भागेदारी अनिवार्य करने के साथ ही बाहरी लोगों को यूनियन सदस्य बनाने की सीमा कम करने की तैयारी है। आॅटो इण्डस्ट्रीज को आवश्यक सेवा के दायरे में लेने के प्रयास द्वारा आॅटोक्षेत्र के श्रमिकों को किसी भी विरोध या आन्दोलन के संवैधानिक अधिकारों से वंचित करने की कोशिशें पिछली सरकार के समय से ही जारी हैं। मैनयूफैक्चरिंग सेक्टर (एनएमजेड) में नियमों में खुली छूट देते हुए उसे लगभग कानून मुक्त बनाने की तैयारी है। औद्योगिक विवाद अधिनियम-1947 को भी पंगु बनाने के प्रयास जारी हैं।  

कार्पोरेट जगत से था मोदी का वायदा 

प्रधानमंत्री मोदी द्वारा चुनाव पूर्व कार्पोरेट जगत से किये गये करारों में यह अहम था, इसीलिए सरकार बनते ही महत्वपूर्ण कामों में श्रमकानून में इतना भारी बदलाव हुआ। पिछले लम्बे समय से देश और दुनिया के मुनाफाखोर पुराने कानूनों को बाधा मानते रहे हैं और सरकारों पर खुली छूट देने वाले ”लचीला“ कानून बनाने का दबाव बनाते रहे हैं। इस मुद्देपर सारे पूँजीपति एकजुट हैं।
सरकार से लेकर शाषन-प्रशासन व न्याय पलिका तक इनके हित में खड़ी हैं। यह गौरतलब है कि 1991 में नर्सिंहा राव-मनमहोन सिंह की सरकार ने देश को वैश्विक बाजार की शक्तियों के हवाले करते हुए जनता के खून-पसीने से खड़े सार्वजनिक उपक्रम को बेचने के साथ मज़दूर अधिकारों को छीनने का दौर शुरू किया था। बाजपेई की भाजपा नीत सरकार के दौर में सबसे खतरनाक मज़दूर विरोधी द्वितीय श्रम आयोग की रिपोर्ट आई। नया श्रमकानून इसी प्रक्रिया का मूर्त रूप है।
जहाँ आज के बदलते और गतिमान दौर में मज़दूर वर्ग को और ज्यादा सहूलियतें व नौकरी की गारण्टी चाहिए, सुरसा के मुंह की तरह बढ़ती महंगाई के दौर में सम्मानजनक वेतन चाहिए, वहाँ वहाँ मोदी सरकार ने पहले से ही मिल रहे कानूनी अधिकारों में ही डकैती डाल दी। इस बदलाव के साथ सरकार मज़दूर आबादी को एक ऐसा टूल बना देना चाहती है, जिसे इस्तेमाल करने के बाद कभी भी मालिक वर्ग फेंक सके। मज़दूरों की मेहनत के ही दम पर उत्पादन होता है और उसे ही यूज ऐण्ड थ्रो की वस्तु बनाया जा रहा है।