Friday, December 9, 2016

नोटबंदी की आड़ में कर्मचारियों के पीएफ पर डाका

अभी नोटबंदी से केंद्र की मोदी सरकार उबर नहीं पाई लेकिन उसने पीएफ के मामले में नियमों में बड़ा बदलाव करते हुए पीएफ कटवाने की अनिवार्यता खत्म कर दी है। नए नियम के अनुसार, पीएफ कटवाना या न कटवाना कर्मचारियों की मर्जी पर निर्भर करेगा।
अब 15 हजार रुपए प्रति माह से कम वेतन पाने वाले कर्मचारी के पास अपना पीएफ कटवाने या न कटवाने का विकल्प होगा। यानी पीएफ कटवाना जरूरी नहीं होगा। श्रमिक संगठनों का कहना है कि ये कानून लाकर मोदी सरकार असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों की आर्थिक सुरक्षा घेरे को खत्म करने का काम किया है और सरकार धीरे धीरे पीएफ की व्यवस्था को कंपनियों की मर्जी के मुताबिक करने का रास्ता खोल दिया है।
उल्लेखनीय है कि पीएफ़ में जितने रुपये श्रमिक के वेतन से कटते हैं उतने ही रुपये सरकार मिलाती है और इस तरह मज़दूर की यही कुल जमा पूंजी होती है जिसे वो अपने मुसीबत के दिनों में इस्तेमाल करता है।  
पीएम नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में बैठक हुई थी और एपीएफ कानून का संशोधन किए बिना ही इस संदर्भ में नोटिस जारी कर दिया गया। नोटिस में कहा गया है कि रोजगार के अवसर बढ़ाने और एक्पोर्ट सेक्टर को मजबूत करने को ध्यान में रखते हुए यह कदम उठाया गया है। सूचना में कहा गया है कि लेबर कानूनों के आसान बनाने को ध्यान में रखते हुए यह बदलाव किया गया है। हालांकि यह बदलाव फिलहाल एक्सपोर्ट इंडस्ट्री के लिए लागू किया गया है। अन्य क्षेत्रों के लिए बाद में फैसला लिया जाएगा।
नोटिस में कहा गया है कि एक्सपोर्ट इंडस्ट्री में रोजगार के अवसर बढ़ाने और उसे मजबूत बनाने के उद्देश्य से नियमों में बदलाव किया गया है। इसके अलावा, श्रम से जुड़े कानूनों को आसान बनाने के लिए बदलाव किया गया है।
इससे पहले मजदूरों के प्राविडेंट फंड को निकालने को लेकर मोदी सरकार ने कड़े नियम बना दिए थे जिसके बाद बैंगलोर में मजदूरों का हिंसक प्रदर्शन हुआ और उसके बाद सरकार को ये आदेश वापस ले लेना पड़ा था।

Monday, August 25, 2014

मज़दूर हितों पर एक बड़ा हमला  

केन्द्रीय मंत्रीमण्डल ने पारित किया नया श्रमकानून


अभी विरोध के स्वर उठ भी नहीं सके थे कि नरेन्द्र मोदी सरकार ने मज़दूर आबादी पर बड़ा हमला बोल दिया है। केन्द्रीय मन्त्रीमण्डल ने आज ”अच्छे दिन“ के सौगात के तौर पर कार्पोरेट जगत के हित में श्रमकानूनों में बदलाव का प्रस्ताव पारित कर दिया। इसका मूल मंत्र है ‘‘हायर एण्ड फायर’’ यानी जब चाहो काम पर रखो, जब चाहो निकाल दो। फिलहाल फैक्ट्री अधिनियम-1948, श्रम विधि (विवरणी देने व रजिस्टर रखने से कतिपय स्थानों में छूट) अधिनियम-1988, अपरेण्टिस अधिनियम, 1961 में कुल 54 संशोधनों पारित हो गये।

यह मोदी सरकार का सबसे महत्वपूर्ण एजेण्डा था। राजस्थान की भाजपा सरकार पहले ही ऐसे कानून बना चुकी थी। उल्लेखनीय है कि केन्द्र सरकार द्वारा गुपचुप तरीके से 5 जून को फैक्ट्री अधिनियम-1948 में, 17 जून को न्यूनतम वेतन अधिनियम-1948, 23 जून को श्रम विधि (विवरणी देने व रजिस्टर रखने से कतिपय स्थानों में छूट) अधिनियम-1988 के साथ ही अपरेण्टिस अधिनियम-1961 व बाल श्रम (निषेध एवं नियमन) अधिनियम-1986 में भारी संशोधन का नोटिस जारी किया था।

यही नहीं, देश के महत्वपूर्ण ऑटो इण्डस्ट्री के क्षेत्र को आवश्यक सेवा में लाने का भी प्रस्ताव आ चुका है। ट्रेड यूनियन अधिनियम, 1926 व औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 में भी फेरबदल की तैयारी चल रही है। इस मज़दूर विरोधी कदम का देश के विभिन्न हिस्सों में विरोध भी हो रहा था। यही नहीं, देश की व्यापक मज़दूर आबादी को तो इसका इल्म तक नहीं था कि क्या होने जा रहा है। लेकिन सबको दरकिनार कर और मज़दूर वर्ग से बगैर सलाह-मशविरे के मोदी सरकार ने ये कारनामा कर दिया। अब तो महज संसद में इसे पारित होने की देर है और मज़दूरों को हलाल करने का कानून अस्तित्व में आ जाएगा।

 ”हायर एण्ड फायर“ की तर्ज पर होगा नया श्रमकानून

 प्रस्तावित संशोधनों में साफ तौर पर लिखा था कि ”इससे काम करने वालों और उद्योग दोनो को मुक्त माहौल मिले। ...इससे तुरंत नौकरी देने व तुरंत निकालने की समस्या दूर होगी।“ मतलब साफ है। प्रबन्धन को जब चाहे काम पर रखने और जब चाहे निकालने की खुली छूट होगी। नये कानून के तहत जिस कारखाने में 300 से कम मज़दूर होंगे उसकी बन्दी, लेआॅफ या छंटनी के लिए मालिकों को सरकार से इजाजत नहीं लेनी होगी। पहले यह 100 श्रमिकों से कम संख्या वाले कारखानों पर लागू था। वैसे भी आज ज्यादातर कारखानों की स्थिति यह है कि कम्पनी इम्पलाई बेहद कम रखे जाते हैं।
अधिकतर काम बेण्डरों से या ठेके पर करा लिया जाता है। मतलब यह कि मनमाने तौर पर छंटनी और कम्पनी बन्द करने का कानूनी रास्ता और खुल जाएगा। प्रस्तावों में उत्पादकता व कारोबार के कथित कमी पर मैन पाॅवर कम करने यानी मनमर्जी छंटनी की छूट भी होगी। बदले कानून में ठेका प्रथा को मान्यता मिल जाएगी। यहाँ तक कि ठेका कानून 20 कर्मकारों की जगह 50 कर्मकारों वाले संस्थानों में लागू करने की व्यवस्था है।
महिलाओं से कारखानों में प्रातः 6 बजे से सांय 7 बजे तक ही काम लेने में बदलाव के साथ उनसे नाइट शिफ्ट में भी काम लेने की छूट दी जा रही है। यही नहीं, कम्पनियों को तमाम निरीक्षणों से भी छूट देने, 10 से 40 कर्मकारों वाले कारखानों को इससे पूर्णतः मुक्त करने, कम्पनियों को श्रमविभाग या अन्य सरकारी विभागों में रिपार्ट देने में भी ढील होगी।
यही नहीं, अपरेण्टिस ऐक्ट-1961 में नया प्रावधान यह बन गया है कि प्रबन्धन चाहें जो अपराध करे उसे हिरासत में नही लिया जा सकेगा। ओवरटाइम के घण्टों में इजाफा करते हुए नये कानून के तहत विद्युत की कमी के बहाने मनमर्जी साप्ताहिक अवकाश बदलने, एक दिन में अधिकतम साढ़े दस घण्टे काम लेने को बारह घण्टा करने, किसी तिमाही में ओवरटाइम के घण्टों की संख्या 50 से बढ़ाकर 100 करने का फरमान है। वैसे भी अघोषित रूप से मनमाने ओवरटाइम की प्रथा चल रही है, जहाँ लगातार कई घण्टे खटाने के बावजूद कानूनन डबल ओवर टाइम देना लगभग खत्म हो चुका है। अब तो इसे कानूनी रूप भी मिल गया।

 बदलाव की और भी कोशिशें हैं जारी 

अभी तो ये बस शुरुआत है। यूनियन बनाने के नियम और कठोर करने का प्रावधान आ रहा है, जिसमें कम से कम 30 फीसदी कार्यरत श्रमिकों की भागेदारी अनिवार्य करने के साथ ही बाहरी लोगों को यूनियन सदस्य बनाने की सीमा कम करने की तैयारी है। आॅटो इण्डस्ट्रीज को आवश्यक सेवा के दायरे में लेने के प्रयास द्वारा आॅटोक्षेत्र के श्रमिकों को किसी भी विरोध या आन्दोलन के संवैधानिक अधिकारों से वंचित करने की कोशिशें पिछली सरकार के समय से ही जारी हैं। मैनयूफैक्चरिंग सेक्टर (एनएमजेड) में नियमों में खुली छूट देते हुए उसे लगभग कानून मुक्त बनाने की तैयारी है। औद्योगिक विवाद अधिनियम-1947 को भी पंगु बनाने के प्रयास जारी हैं।  

कार्पोरेट जगत से था मोदी का वायदा 

प्रधानमंत्री मोदी द्वारा चुनाव पूर्व कार्पोरेट जगत से किये गये करारों में यह अहम था, इसीलिए सरकार बनते ही महत्वपूर्ण कामों में श्रमकानून में इतना भारी बदलाव हुआ। पिछले लम्बे समय से देश और दुनिया के मुनाफाखोर पुराने कानूनों को बाधा मानते रहे हैं और सरकारों पर खुली छूट देने वाले ”लचीला“ कानून बनाने का दबाव बनाते रहे हैं। इस मुद्देपर सारे पूँजीपति एकजुट हैं।
सरकार से लेकर शाषन-प्रशासन व न्याय पलिका तक इनके हित में खड़ी हैं। यह गौरतलब है कि 1991 में नर्सिंहा राव-मनमहोन सिंह की सरकार ने देश को वैश्विक बाजार की शक्तियों के हवाले करते हुए जनता के खून-पसीने से खड़े सार्वजनिक उपक्रम को बेचने के साथ मज़दूर अधिकारों को छीनने का दौर शुरू किया था। बाजपेई की भाजपा नीत सरकार के दौर में सबसे खतरनाक मज़दूर विरोधी द्वितीय श्रम आयोग की रिपोर्ट आई। नया श्रमकानून इसी प्रक्रिया का मूर्त रूप है।
जहाँ आज के बदलते और गतिमान दौर में मज़दूर वर्ग को और ज्यादा सहूलियतें व नौकरी की गारण्टी चाहिए, सुरसा के मुंह की तरह बढ़ती महंगाई के दौर में सम्मानजनक वेतन चाहिए, वहाँ वहाँ मोदी सरकार ने पहले से ही मिल रहे कानूनी अधिकारों में ही डकैती डाल दी। इस बदलाव के साथ सरकार मज़दूर आबादी को एक ऐसा टूल बना देना चाहती है, जिसे इस्तेमाल करने के बाद कभी भी मालिक वर्ग फेंक सके। मज़दूरों की मेहनत के ही दम पर उत्पादन होता है और उसे ही यूज ऐण्ड थ्रो की वस्तु बनाया जा रहा है।

Monday, October 10, 2011

आर पार के मुकाम पर है सुजुकी मजदूरों की लड़ाई


भारत में सुजुकी कारपोरेशन की स्वामित्व वाली गुडग़ांव स्थित तीनों कंपनियों की पांच फैक्टरियों में से चार में हड़ताल आज, 10 अक्टूबर, 2011 को भी जारी रही और उनमें उत्पादन पूरी तरह ठप रहा। इन चारों फैक्टरियों में मजदूर पूर्ववत् फैक्टरी के अंदर धरने पर बैठे रहे। हालांकि सुजुकी प्रबंधन द्वारा मजदूरों के हिंसा में लिप्त होने और कुछ मजदूरों को हड़ताल से ''मुक्त'' करवाने की झूठी खबरों को फैलाया जा रहा है, इसका मजदूरों पर मनोबल और एकता पर कोई असर नहीं पड़ा है।

मारुति सुजुकी इण्डिया लि. के प्रबंधन द्वारा पिछले 30 सितम्बर की मध्य रात्रि को हुए समझौते के उल्लंघन करने, मजदूरों का उत्पीडऩ जारी रखने और उन्हें सबक सिखाने की कोशिश के विरोध में आरम्भ हुई इस हड़ताल नें अलग-अलग फैक्टरियों तथा स्थायी और अलग-अलग किस्म के अस्थायी मजदूरों के बीच ऐसी एकता को जन्म दिया और मजबूत किया है जो इस इलाके के मजदूर आंदोलन के इतिहास में अभूतपूर्व है। सुजुकी प्रबंधन मजदूरों की इस एकता को ही तोडऩे की हर सम्भव कोशिश कर रहा है। कल, यानी 9 अक्टूबर को, सुजुकी मोटरसाइकिल इण्डिया प्रा., लि. परिसर में ठेकेदार तिरुपति एसोसिएट से जुड़े हुए गुण्डों द्वारा मजदूरों पर हमला करने की उकसावे की कार्रवाई उसके इसी कोशिश का हिस्सा है। वे यह प्रयास कर रहे हैं कि किसी तरह मजदूरों की इस जायज हड़ताल को एक ''कानून व्यवस्था'' का मुद्दा बनाकर प्रशासन की दखलंदाजी को आमंत्रित किया जाए। लेकिन कल सुजुकी मोटरसाइकिल में उनकी यह कोशिश नाकाम साबित हुई है। मजदूरों के प्रतिनिधि द्वारा लगातार कोशिश करने के बाद आखिरकार पुलिस को एफआइआर दर्ज करने और दो अपराधियों को गिरफ्तार करने को मजबूर होना पड़ा है। हालांकि इस मामले में शुरू में हरियाणा पुलिस का रवैया भी हीला-हवाली का था। लेकिन ठेकेदार के गुण्डों द्वारा की गई कार्रवाई इतनी स्पष्ट तौर पर उकसावे भरी थी कि पुलिस को आखिरकार कार्रवाई करने पर मजबूर होना पड़ा। और मीडिया के अधिकतर हिस्से ने भी घटनाक्रम के उसी रूप को ही प्रकाशित करना पड़ा, जो सही था।

मारुति सुजुकी के मजदूरों की लड़ाई अब ऐसी जगह पर पहुंच गई है जहा पीछे हटने की कोई गुंजाइश नहीं है और सामने जो कुछ है वह आर पार की लड़ाई है। इस लड़ाई में सुजुकी की तीन अन्य फैक्टरियों के मजदूरों ने भी अपने रोजी रोटी और भविष्य को दांव पर लगा दिया है। मजदूरों के बीच भाइचारे का इससे अच्छा उदाहरण मिलना सम्भव नहीं है। ऐसे में वे सभी लोग जो मजदूरों के युगांतरकारी शक्ति और एकता पर विश्वास करते हैं, यह कर्तव्य बन जाता है कि इस लड़ाई को सफलता के मुकाम तक पहुंचाने में अपनी पूरी ताकत लगा दें। क्योंकि, जैसा कि, हमने पहले भी कहा है, यह एक ऐसी लड़ाई है जिसपर सिर्फ मारुति सुजुकी या फिर सुजुकी कारपोरेशन के मजदूरों के भविष्य का फैसला नहीं होने वाला है बल्कि इस पूरे इलाके में मजदूर आंदोलन के भविष्य की दशा दिशा भी तय होने वाली है। पूंजी के एकतरफा हमलावर रवैये के वर्तमान दौर में गुडग़ांव के मजदूरों ने जिस एकता और संयम का प्रदर्शन किया है वह निश्चित तौर पर वह सराहनीय है। और उनके इस संघर्ष को चौतरफा सहयोग और समर्थन दिया जना चाहिए।
हम एक बार फिर सभी राजनीतिक और सामाजिक संगठनों, बुद्धिजीवियों, छात्रों, युवाओं, नागरिकों और समाज के विभिन्न तबके के लोगों को मजदूरों के इस संघर्ष का समर्थन करने और उन्हें हर तरह का सहयोग प्रदान करने की अपील करते हैं।
मारुति-सुजुकी के संघर्षरत साथियों को कोई भी आर्थिक सहयोग 'मारुति सुजुकी एम्प्लाइज यूनियन' के द्वारा इस्तेमाल किये जा रहे निम्न खाते में भेजें :

Account no. 002101566629

IFSC code: ICIC0000021

SHIV KUMAR

ICICI Bank,

Branch- Gurgaon, Sector-14, Haryana, India.


(हम आपसे इस सन्देश को अधिक से अधिक मित्रों-परिचितों तक अग्रसारित करने का भी अनुरोध करते है

Friday, September 23, 2011

बढ़ता जा रहा है मारुति-सुजुकी के मजदूरों को मिलने वाला समर्थन

मारुति सुजुकी मानेसर के जुझारु मजदूरों का संघर्ष विगत 25 दिनों से जारी है। लेकिन अभी गतिरोध के समाधान का कोई संकेत नहीं मिल रहा है। पिछले 25 दिनों से धरने पर बैठे मजदूरों में से कुछ ने हमें यह संकेत दिया है कि कंपनी शायद अगले दो दिनों में इस मामले को सुलझाने के लिए फिर से बातचीत की पहल करे। मजदूर चाहते हैं कि वार्ता शुरू हो और उनको विभिन्न वामपंथी और क्रांतिकारी संगठनों, छात्रों, बुद्धिजीवियों सहित समाज के अन्य तबकों का जो समर्थन मिल रहा है उसके मद्देनजर मारुति सुजुकी इंडिया लिमिटेड के प्रबंधन पर वार्ता शुरू करने का दबाव बढ़ता जा रहा है।
बृहस्पतिवार 22 अगस्त को दिल्ली में दो जगहों पर मारुति सुजुकी के मजदूरों के साथ एकजुटता का इजहार करने के लिए दो छोटे किंतु जोरदार प्रदर्शन हुए। इसके अलावा उनके समर्थन में गुडग़ांव में एक सम्मेलन हुआ तथा बुधवार यानी 21 अगस्त को कोलकाता के मारुति सुजुकी इंडिया लिमिटेड के क्षेत्रीय कार्यालय के सामने भी कई स्थानीय ट्रेड यूनियनों ने मिलकर प्रदर्शन किया। यही नहीं जापान की राजधानी टोकियो स्थित मारुति मोटर मोटर कारपोरेशन के मुख्यालय के सामने भी एक जोरदार प्रदर्शन करते हुए इस बुहराष्ट्रीय कंपनी से भारत में अपने मजदूर विरोधी कारगुजारियों को तुरंत रोकने और मारुति सुजुकी, मानेसर के माजदूरों की जायज मांगों को तत्काल स्वीकार करने की मांग की गई।
मारुति सुजुकी के मजदूरों के संघर्ष के समर्थन में कल दिल्ली में दो जगहों पर प्रदर्शन हुए। विभिन्न वामपन्थी और क्रान्तिकारी संगठनों और ट्रेड यूनियनों ने संयुक्त रूप से हरियाणा भवन पर एक जोरदार प्रदर्शन किया. वहाँ हुई सभा में वक्ताओं ने मारुति-सुजुकी इण्डिया लिमिटेड प्रबन्धन के दमनकारी और मजदूर विरोधी तौर तरीकों की कड़ी आलोचना की और इस मामले में केन्द्र और हरियाणा सरकार के रवैये की भी कड़े शब्दों में भर्सना की। अपराह्न बारह बजे से आरम्भ होकर सभा करीब तीन बजे तक जारी रही। सभा में हरियाणा सरकार से मारुति सुजुकी के मैनेजमेंट के अड़ियल रवैये के चलते जारी गतिरोध को तुरन्त सुलझाने की माँग की गयी और इस सम्बन्ध में अधिकारीयों को ज्ञापन दिया गया। इस प्रदर्शन में क्रांतिकारी युवा संगठन, आल इंडिया ट्रेडयूनियन्स फेडरेशन, इंकलाबी मजदूर केंद्र, मजदूर एकता केंद्र, क्रांतिकारी नौजवान सभा, मजदूर एकता कमेटी, यूथ फार सोशल जस्टिस आदि दिल्ली के ढेरो छोटे बड़े संगठनों के प्रतिनिधि शामिल थे।
मारुति सुजुकी के संघर्ष के समर्थन में एक ट्रेड यूनियन संगठन, न्यू ट्रेड यूनयिन इनशिएटिव, की ओर से दूसरा प्रदर्शन तीस हजारी मेट्रो स्टेशन के सामने हुआ। ये दोनों प्रदर्शन अपेक्षाकृत छोटे ही थे लेकिन इन्होने इस आन्दोलन को विभिन्न संगठनों और समाज के विभिन्न हिस्सों से प्राप्त हो रहे समर्थन को अभव्यिक्ति प्रदान की।

Wednesday, September 21, 2011

मारुति सुजुकी के मजदूरों के समर्थन में हरियाणा भवन पर प्रदर्शन

प्रिय साथी,
मारुति सुजुकी के मानेसर प्लाटं के संघर्षरत मजदूरों के समर्थन में कल (बृहस्पतिवार. 22 सितंबर, 2011 को) दिल्ली में कार्यरत विभिन्न संगठनों और ट्रेड यूनियनों का हरियाणा भवन पर संयुक्त धरना आयोजित किया जा रहा है। धरना सुबह 11 बजे से शुरू होगा। इस हेतु हम सभी मंडी हाउस के पास इकट्ठा होंगे। आप सभी से अनुरोध है कि अधिक से अधिक संख्या में भागीदारी करें और इस संदेश को अधिक से अधिक मित्रों को अग्रसारित करें।


धन्यवाद

Friday, September 16, 2011

संघर्ष के कोष में सहयोग की अपील

प्रिय साथी,

मारुति सुजुकी इम्प्लाइज युनियन के साथियों के ओर से हमें निम्न विज्ञप्ति प्राप्त हुई है. हम आप सभी से इस पर गौर फरमाने और इसे अधिक से अधिक साथियों तक अग्रसारित करने की अपील करते है. इसका अंग्रेजी प्रारूप इसके ठीक पहले भेजा गया है :




मारुति सुजुकी एम्पलाइज यूनियन (एम.एस.ई.यू.)


16 सितम्बर, 2011


अपील


मारुति सुजुकी एम्पलाइज यूनियन का संघर्ष एक महत्वपूर्ण स्थिति में पहुँच गया है। हम आप सबसे अनुरोध कर रहे हैं कि हमारे यूनियन को नैतिक समर्थन के साथ-साथ आर्थिक सहायता पहुंचाकर इस लड़ाई को जीत के मुकाम तक पहुंचाने में मदद करें।


मानेसर-गुड़गांव-धारूहेड़ा-बावल औद्योगिक क्षेत्र के सभी मजदूर और, खास कर, सुजुकी पॉवरट्रेन इण्डिया लिमिटेड, सुजुकी कास्टिंग्स और सुजुकी मोटरसाइकिल इण्डिया प्राइवेट लिमिटेड के मजदूर हमारे समर्थन में खड़े हुए हैं। इसके साथ ही हमें देश और दुनिया भर के मेहनतकश वर्ग तथा इससे सहानुभूति रखने वाले जनता का समर्थन प्राप्त है।


हमारी माँगें :
1. यूनियन गठन करने का मजदूरों का अधिकार।
2. सभी चार्ज शीट को खत्म किया जाये।
3. सभी टर्मिनेशन और सस्पेंशन को वापस लिया जाए।
4. ठेका मजदूरों की माँगें मानी जाये।


मारूती सुजुकी मैनेजमेण्ट द्वारा, हम मारूती सुजुकी के मजदूर साथियों पर पुलिसया दमन और असमाजिक तत्वों के बल पर दमनकारी नीतियों का विरोध करते हैं।


आप अपनी सहायता राशि निम्नलिखित खाते में भेज सकते हैं:
शिव कुमार
खाता संख्या: 002101566629
IFSC Code : ICIC0000021
ICICI Bank,
Branch - Gurgaon, Sector-14, Haryana (India)
आप अपने सहायता राशि देने के बाद हमें email : mseu.manesar@gmail.com पर सुचित करें जिससे कि मारुति सुजुकी एम्पलाइज युनियन आपके ईमेल का उत्तर दे कर मिली राशि को आपको बता सके।


इन्क़लाबी सलाम
सोनू कुमार
अध्यक्ष
शिव कुमार
महासचिव
सुमित कुमार
खजांची
मारुति सुजुकी एम्पलाइज युनियन

मारुति-सुजुकी, मानेसर के संघर्षरत मजदूरों के समर्थन में आन्दोलन व्यापक हुआ

आन्दोलन को फैलने से रोकने के लिए मारुति-सुजुकी ने अपने दोनों संयंत्र बन्द किये

कल 14 सितम्बर की शाम को बहूराष्ट्रीय कम्पनी सुजुकी के मालिकाने वाली तीन इकाइयों, सुजुकी पवारट्रेन इण्डिया लि., सुजुकी कास्टिंग्स और सुजुकी मोटरसाईकल इण्डिया प्रा.लि. के मजदूरों के मारुति-सुजुकी इण्डिया लि., मानेसर के संघर्षरत मजदूरों के समर्थन में हड़ताल में चले जाने से डर कर मारुति-सुजुकी प्रबन्धन ने आज गुडगाँव और मानेसर स्थित अपने दोनों फैकटारियों को कल शुक्रवार को बन्द घोषित कर दिया. शनिवार को विश्वकर्मा पूजा की छुट्टी है और अगला दिन रविवार है, इस तरह दोनों कारखाने अगले तीन दिनों तक बन्द रहेंगे और इस तरह से वे दावानल की तरह फैलते हुए आन्दोलन की आग को रोक देना चाहते है. इस बीच मारुति-सुजुकी इण्डिया लि.के मानेसर संयन्त्र लड़ाकू साथियों का संघर्ष आज 18 वें दिन में प्रवेश कर गया और उनके समर्थन में सुजुकी पवारट्रेन इण्डिया लि., सुजुकी कास्टिंग्स और सुजुकी मोटरसाईकल इण्डिया प्रा.लि. के मजदूरों का धरना आज भी जारी रहा.

सुजुकी पवारट्रेन इण्डिया लि. मारुति सुजुकी इण्डिया लि. के लिए डीजल इंजनों और ट्रांस्मिसनों का निर्माण करती है, और इसमे 1250 स्थायी और प्रशिक्षु तथा 600 ठेका मजदूर हैं. सुजुकी कास्टिंग भी इसी के अन्तर्गत आती है और इसमें 350 -400 स्थायी और प्रशिक्षु तथा 500 ठेका मजदूर कार्यरत हैं. सुजुकी मोटरसाईकल इण्डिया प्रा.लि. में 1200 -1400 मजदूर हैं जो प्रतिदिन 1200 मोटरसाइकिल और स्कूटरों के उत्पादन का अत्यधिक कठिन लक्ष्य हासिल करते हैं. इस तरह से सुजुकी समूह के करीब 4500 कामगार मारुति सुजुकी की लड़ाई के साथ एकजुटता में हड़ताल पर हैं. इन तीनों कारखानों में श्रमिकों की कुल संख्या को 'बिजनेस लाइन' ने 7000 बताया है. मारुति-सुजुकी के गुडगाँव संयंत्र को भी इस चपेट में आने से रोकने के लिए ही कम्पनी प्रबन्धन ने शुक्रवार को छूती की घोषणा की है.

मारुति-सुजुकी के संघर्षरत श्रमिकों को पूरे गुडगाँव-मानेसर-धरुहेरा औद्योगिक पट्टी में मजदूरों और ट्रेड यूनियनों का व्यापक समर्थन हासिल है और उसने पूरे इलाके में संघर्ष की नयी चेतना का संचार कर दिया है. इस आन्दोलन का ही प्रभाव है कि ऑटो पार्ट्स का निर्माण करने वाली निकटवर्ती मुंजाल सोवा के 1200 अस्थायी मजदूर विगत 12 सितम्बर को काम करने की अमानवीय परिस्थितिओं और मालिकों की मनमर्जीपन के खिलाफ हड़ताल पर चले गए. उन्हें हरियाणा में लागू न्यूनतम वेतन से भी कम 4000 से 4500 रुपयों का वेतन दिया जाता था. मालिकों ने फैलते मजदूर आन्दोलन के डर से भयभीत होकर 13 सितम्बर की मध्यरात्रि को मजदूरों से समझौता कर लिया और उन्हें 125 श्रमिकों को तुरन्त स्थाई बनाने और शेष को तीन वर्षों के प्रशिक्षण के पश्चात स्थाई बनाने का वादा करने पर मजबूर होना पड़ा.

भारत में सबसे अधिक संख्या में कारों का निर्माण करनेवाली एक भीमकाय बहुराष्ट्रीय कम्पनी और उसके पीछे खड़ी केंद्र और राज्य सरकारों तथा पूरी राज्यसत्ता की शक्ति का मारुति-सुजुकी के ये नौजवान मजदूर जिस दृढ़ता और बहादूरी के साथ मुकाबला कर रहे है वह बेमिसाल है और उसीने आज पूरे सुजुकी समूह के कामगारों को एकजुट कर दिया है. लेकिन संघर्ष की यह डगर फिर भी कठिन है और उन्हें और अधिक समर्थन, सहयोग और एकजुटता की जरूरत है. हम सभी से उन्हें यह समर्थन और सहयोग मुहैया करने की अपील को एक बार फिर दोहराते हैं.

कल शुक्रवार 16 सितम्बर को गुडगाँव के कमला मार्केट में आयोजित गुडगाँव-मानेसर-धारूहेड़ा बेल्ट के सभी ट्रेड यूनियनों और मजदूर संगठनों की संयुक्त रैली से आन्दोलन को और गति, सहयोग और समर्थन हासिल होने की उम्मीद है.

-रेड ट्यूलिप