Saturday, August 14, 2010

चीन की आर्थिक वृद्धि श्रमिकों के शोषण के कारण

मैक्लॉडगंज, एजेंसी : ता दलाई लामा का मानना है कि चीन आर्थिक क्षेत्र में भारत से आगे हो सकता है, लेकिन वह स्वतंत्रता, पारदर्शिता और कानून के शासन जैसे बुनियादी मूल्यों में उससे पीछे है। उनका यह भी कहना है कि चीन की आर्थिक समृद्धि की मुख्य वजह बाहरी पैसा और श्रमिकों के आर्थिक शोषण है। यही वजह है कि चीन के बुद्धिजीवी और कुछ नेता अब बदलाव चाहते हैं।
दलाई लामा ने कहा कि हाल के दशकों में चीन की आर्थिक वृद्धि बाहरी धन और सस्ते श्रमिकों के शोषण पर आधारित है। राजनीतिक रूप से अभी तक वहां सब कुछ नियंत्रित है। उन्होंने कहा, 'मुक्त दुनिया की ताकत केवल पैसे ही नहीं वरन अन्य चीजों पर भी निर्भर है। चीन में यह केवल पैसे की ताकत है।Ó
उन्होंने कहा कि लंबे समय में चीन के बुद्धिजीवियों और कुछ नेताओं ने महसूस किया कि वहां एक कमजोरी है और वे बदलाव चाहते हैं। वे आर्थिक और राजनीतिक दोनों क्षेत्रों का आधुनिकीकरण चाहते हैं। चीन में यह बदलाव की बयार है। दलाई लामा ने कहा कि जापान को पीछे छोड़कर दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनना एक सकारात्मक कदम है।
। इससे चीन को तिब्बत जैसे मुद्दों को सुलझाने का आत्म-विश्वास मिलेगा।

मनरेगा से नहीं रुका पलायन, कोसी से सात लाख श्रमिकों का पलायन

कोसी में महिलाओं के भरोसे कृषि कार्य
- पुरुष श्रमिकों के पलायन से खेती प्रभावित
सहरसा, 14 अगस्त

आर्थिक रूप से पिछड़े कोसी इलाके को श्रमिकों का गढ़ माना जाता रहा है। परंतु विगत कुछ वर्षों में पुरुष श्रमिकों के बढ़े पलायन ने यहां की कृषि व्यवस्था को प्रभावित किया है। हालांकि सरकार ने मजदूरों के पलायन को रोकने के लिए महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी एकक्ट (मनरेगा) के तहत 100 दिन के रोजगार देने की योजना चला रखी है, लेकिन इसका नतीजा सिफर ही दिख रहा है। नतीजतन कोसी के इलाके में कृषि कार्य महिलाओं के कंधों पर जा टिका है। इससे कृषि व्यवस्था प्रभावित हुई है।
अप्रैल से जून माह के बीच तीन महीने में इस इलाके के सात लाख से अधिक पुरुष श्रमिक बढिय़ा मजदूरी की आस में हरियाणा, पंजाब व अन्य प्रदेशों में पलायन करते हैं। मजदूरों के पलायन का आलम यह रहता है कि इस बार मई माह में सहरसा-अमृतसर के बीच चलने वाली जनसेवा एक्सप्रेस में भारी भीड़ की वजह से जगह नहीं मिलने से आक्रोशित मजदूरों ने सहरसा जंक्शन पर भारी बवाल किया था। अंतत: मजदूरों की भारी भीड़ को देखते हुए रेल प्रशासन ने जनसेवा-2 नामक दूसरी ट्रेन चलायी। ऐसी हालत में जुलाई व अगस्त माह में कोसी इलाके में होने वाली धान रोपाई के वक्त मजदूरों की भारी कमी हो जाती है।
वर्ष 2001 के आंकड़ों के अनुसार जिले में कृषकों की कुल संख्या 1,83,501 है। मजदूरों की बात करें तो जिले में सिर्फ जाबकार्ड धारी मजदूर 9,34,904 हैं। जिले में कुल श्रमिकों की संख्या 12 लाख के करीब है, जिनमें चार लाख के करीब महिला श्रमिक हैं। इनके कंधे पर ही कृषि व्यवस्था जा टिकी है।
कृषि विभाग से मिली जानकारी अनुसार इस बार महज 38 हजार हेक्टेयर भूमि में ही धान रोपाई हो सकी है, जबकि लक्ष्य 65 हजार हेक्टेयर भूमि में रोपनी का था। कम रोपनी के पीछे जहां सुखाड़ एक कारण है, वहीं दूसरा कारण श्रमिकों की कमी भी है।
नरियार गांव के किसान लाल बहादुर सिंह व प्रभु ंिसंह कहते हैं कि मजदूरों के परदेस पलायन करने की वजह से उन लोगों ने अपने अधिकांश खेत बटाई पर दे रखे हैं। महिषी प्रखंड अंतर्गत राजनपुर गांव के किसान मो. हफीज व बीसो यादव भी मानते हैं मजदूरों की कमी की वजह से खेती करना मुश्किल हो गया है। वहीं धान रोपाई कार्य में जुटी रंगीनिया महादलित टोला की घोलटी देवी, बेचनी देवी, सारो देवी, रधिया देवी, मीना देवी व रेखा देवी कहती हैं पति धान रोपने पंजाब चले गए हैं। आखिर यहां रहकर पेट भी तो नहीं भर सकता। रधिया देवी कहती हैं यहां वे लोग मजदूरी कर बच्चों व अपना भरण-पोषण कर लेते हैं। पति जो लाएंगे वह बचत होगी।
धान रोपाई का कार्य पंजाब से लौट रहे मधेपुरा जिलान्तर्गत बड़हरी गांव निवासी पहाड़ी ऋषिदेव, चलित्तर ऋषिदेव, सिरसीया के रामोतार सादा ने सहरसा जंक्शन पर बताया कि वे लोग धान रोपाई कर लौट आए हैं। अब दशहरा बाद अक्टूबर में धान काटने पुन: जाएंगे।

Wednesday, August 11, 2010

तमाम देशों में मजदूरों से बेसी मूल्य निचोड़ने का अनुपात कुछ यूं है

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बीमार चाय बागानों के मजदूरों के दिन बहुरेंगे

मजदूरों को अब तक करीब 400 करोड़ रुपये के वेतन व एरियर का भुगतान बकाया-
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को चाय बागानों का प्रबंधन अधिग्रहण करने को कहा
आईयूएफ की ओर से दायर जनहित याचिका पर अहम फैसला
देहरादून, 11 agust:


उत्तराखंड समेत देश के सभी बीमार चाय बागानों के श्रमिकों के दिन बहुरने वाले हैं। सुप्रीम कोर्ट ने केेंद्र सरकार को देश के सभी बीमार चाय बागानों के प्रबंध तंत्र का अधिग्रहण करने के निर्देश दिए हैं, ताकि नारकीय हालात में काम कर रहे वहां के मजदूरों को रुका एरियर और वेतन दिया जा सके।
एक मामले की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने देखा कि ज्यादातर चाय बागान उनके मालिकों द्वारा छोड़ दिए गए हैं। ऐसे में चाय बागानों के मजदूरों को बरसों से न तो मजदूरी मिल रही है न सुविधाएं, जिससे चाय बागानों के मजदूर भुखमरी की हालत में हैं। सरकारों ने कुछ प्रयास किया, मगर उसका कोई असर नहींहुआ है। इंटरनेशनल यूनियन ऑफ फूड, एग्रीकल्चर, होटल, रेस्टोरेंट, कैटरिंग, टोबैको, प्लांटेशन एंड एलाइड वर्कर्स एसोसिएशन (आईयूएफ)की ओर से दायर एक जनहित याचिका का निस्तारण करते हुए मुख्य न्यायाधीश एसएच कपाडिय़ा, न्यायमूर्ति केएस राधाकृष्णन व स्वतंत्र कुमार की बेंच ने कहा है कि इस स्थिति में केद्र सरकार को टी-एक्ट 1953 के तहत अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी निभानी होगी। कोर्ट ने केद्र को बागानों काप्रबंधन अपने हाथ में लेकर छह माह के भीतर मजदूरों को उनके अवशेष के भुगतान के आदेश दिए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने 10 साल से वेतन और ग्रेच्युटी से वंचित उत्तराखंड , हिमाचल प्रदेश, असम, पश्चिमी बंगाल, त्रिपुरा, केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु आदि के चाय बागानों के मजदूरों को मनरेगा के तहत काम देने को भी कहा है। कोर्ट ने मजदूरों को आईसीडीएस योजना और सार्वजनिक वितरण प्रणाली का लाभ देने को भी कहा है।
2006 में सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील व मानवाधिकार कार्यकर्ता कोलिन गोंजाल्विस ने यह जनहित याचिका दायर की थी। उनके मुताबिक आईयूएफ की ओर से दायर याचिका में कहा गया था कि चाय बागानों के मजदूरों को अब तक करीब 400 करोड़ रुपये के वेतन व एरियर का भुगतान नहीं हुआ है। अब मालिकों व कंपनियों द्वारा छोड़ दिए गए बागानों की नीलामी से यह राशि बटोरी जाएगी। एटक से जुड़ी देहरादून की चाय बागान मजदूर यूनियन के अध्यक्ष अशोक शर्मा का कहना है कि यह चाय बागान मजदूरों की एक बहुत बड़ी जीत है।

अब तमिलनाडु में बरपा बिहारी मजदूरों पर कहर

बिहारशरीफ, 11 agust

अभी कर्नाटक में बिहारी छात्रों पर कहर बरपाने का मामला ठंडा भी नहीं हुआ है कि तमिलनाडु के कोयंबटूर जिले के गणेशपुरम में रहने वाले बिहारियों की खोज-खोज कर पिटाई की जा रही है। कोयंबटूर के गणेशपुरम ऑटो सेल माउल्ड प्राईवेट कंपनी में कार्यरत नालंदा जिला के सिलाव थाना अन्तर्गत देवरिया गांव निवासी विनय कुमार ने फोन से इसकी जानकारी दी है। उसके अनुसार कुछ दिनों पूर्व इसी इलाके में एक तामिल युवती के साथ दुष्कर्म हुआ जिसका आरोप बिहारी मजदूरों पर लगा। प्रतिशोध में स्थानीय लोग बिहारियों पर कहर बनकर टूट पड़े हैं।
विनय के अनुसार वह आईटीआई से डिप्लोमा करने के बाद एक वर्ष के लिए प्रशिक्षण लेने कोयंबटूर पहुंचा है, लेकिन यहां जान आफत में पड़ गई है। उसने बताया कि उसकी कंपनी में बिहार के करीब 200 लोग कार्यरत हैं, जो स्थानीय लोगों से सहमे हुए हैं। भय के कारण यहां पर कार्यरत कर्मी अपने घर जाना चाहते हैं, लेकिन कंपनी वाले यह कह कर मजदूरी नहीं दे रहे हैं कि बाहर जाने पर स्थानीय लोग उनके साथ कुछ भी कर सकते हैं।
सहमे विनय ने बताया कि वे लोग किसी अनहोनी की आशंका से चिंतित हैं। उसके अनुसार बिहारियों ने स्थानीय प्रशासन से भी वहां से बाहर निकालने की गुहार लगाई, लेकिन उनलोगों की एक नहीं सुनी गई।

Tuesday, August 10, 2010

कर्नाटक में बिहारी मजदूरों का फिर दमन

-सालों से काम कर रहे १०० मजदूरों को निकाला
- मजदूरी बढ़ाने की मांग पर की पिटाई

शेखपुरा (बिहार), १० अगस्त


कर्नाटक के धारवाड़ जिले में कार्यरत बिहारी मजदूरों के साथ मंगलवार को नियोक्ता ने फिर दमनात्मक रवैया अपनाया। मजदूरी बढ़ाने समेत अन्य मांगों को लेकर कंपनी केप्रोजेक्ट मैनेजर से गुहार लगाने गए मजदूरों की जमकर पिटाई की गई तथा पांच साल से कार्यरत श्रमिकों को बल पूर्वक हटा दिया गया।
जानकारी के मुताबिक यह घटना धारवाड़ (कर्नाटक) जिले के गुजरात एनआरई कोक लिमिटेड इंडस्ट्रीज एरिया वेल्लूर में हुई। कम्पनी के अफसरों ने मजदूरों की पिटाई के बाद शेखपुरा के मनोज ढाढ़ी को बंधक बना लिया। इसकी जानकारी वहां कार्यरत मजदूर मुकेश कुमार ने मोबाइल फोन पर दी। यहां यह बताना जरूरी है कि इसी साल मार्च में इसी कम्पनी ने बिहारी मजदूरों के साथ जमकर मनमानी की थी, जिसमें मीडिया की सक्रियता तथा शेखपुरा जिला प्रशासन की पहल पर बिहार सरकार को हस्तक्षेप करना पड़ा था। धारवाड़ से फोन पर इसुआ (शेखपुरा) के मुकेश ने बताया कि बिहार सरकार के हस्तक्षेप पर मार्च में हुए समझौते को लागू करने की मांग को लेकर मंगलवार को बिहारी मजदूरों ने कंपनी के प्रोजेक्ट मैनेजर से बात करनी चाही तो प्राइवेट गार्डों से कहकर मजदूरों को लाठी से पिटवाया गया। प्रोजेक्ट मैनेजर ने बिहारी मजदूरों को काम से हटाकर स्थानीय मजदूरों को रख लिया है।
काम से हटाए गए मजदूरों की संख्या 100 से ऊपर है। जिसमें शेखपुरा, लखीसराय, नालंदा, पटना, सिवान, गोपालगंज के लोग शामिल हैं। बिहार राज्य ढाढ़ी विकास मंच के प्रदेश अध्यक्ष ललन कुमार तथा कोषाध्यक्ष हरिकिशोर कुमार ढाढ़ी ने इस मसले पर मुख्यमंत्री से राजनीतिक व प्रशासनिक हस्तक्षेप कर बिहारी मजदूरों के हितों की रक्षा की मांग की है।

Monday, August 9, 2010

असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को भी पेंशन

केंद्रीय मंत्रिमंडल का फैसला, करीब 40 लाख मजदूरों को मिलेगा स्वावलंबन योजना का फायदा, चार साल में सरकार देगी दस अरब रुपये
नई दिल्ली, 9 अगस्त

संगठित क्षेत्र के मजदूरों को भी अब बुढ़ापे में पेंशन की सुविधा मिल पाएगी। सरकार ने इस वर्ग को स्वावलंबन योजना का फायदा देने का फैसला किया है। योजना के तहत असंगठित क्षेत्र के जो मजदूर नई पेंशन योजना (एनपीएस) में खाता खोलेंगे, उनके खाते में केंद्र सरकार हर साल 1,000 रुपये का योगदान देगी। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में सोमवार को इस संबंध में एक प्रस्ताव को मंजूरी दी गई। इस उद्देश्य से एक हजार करोड़ रुपये का प्रावधान भी किया गया है।
इस योजना को अगले चार साल 2013-14 तक के लिए लागू किया जाएगा। हर साल असंगठित क्षेत्र के 10 लाख मजदूरों को स्वावलंबन योजना में शामिल किया जाएगा। इस तरह चार साल में 40 लाख श्रमिक इसके तहत शामिल होंगे। योजना को पेंशन फंड नियमन और विकास प्राधिकरण (पीएफआरडीए) के जरिए लागू किया जाएगा। इसका फायदा असंगठित क्षेत्र के उन सभी कामगारों को मिलेगा, जो एनपीएस में हर साल 1,000 रुपये से 12,000 रुपये तक जमा कराएंगे। सरकार ने आश्वासन दिया है कि अगर योजना में ज्यादा कामगार शामिल होते हैं, तो वह और राशि इसके लिए आïवंटित करेगी। स्वावलंबन योजना की घोषणा वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने इस साल बजट पेश करते हुए की थी। देश के असंगठित क्षेत्र में करीब 30 करोड़ लोगों को रोजगार मिला हुआ है, लेकिन इनके लिए पेंशन आदि की कोई ठोस व्यवस्था नहीं है।

कुएं की मिट्टी ढहने से दो मजदूरों की मौत

मेरठ 6 अगस्त
जिला मुख्यालय से करीब 30 किमी दूर गांव असीलपुर में कुएं की सफाई करते समय दो मजदूरों की मौत हो गई।
मृतक के परिजनों और गांव के लोगों ने मौके पर पहुंचे पुलिस अधिकारियों के समक्ष मुआवजे की मांग को लेकर काफी हंगामा किया। थाना किठार पुलिस ने बताया कि गांव में आज कुएं की सफाई का काम हो रहा था। इस दौरान अचानक मिटटी की ढांग भरभरा कर गिर गई। जिसमें दो मजदूर दब गए। शोर सुनकर आसपास के ग्रामीण मौके पर पहुंच कर जब तक मजदूरां को बाहर निकालते तब तक उनकी मौत हो चुकी थी। मृतकों के शवों को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया है।

अमेरिका में बेरोजगारी की दर जुलाई में 9.5 प्रतिशत रही

वाशिंगटन, 6 अगस्त
नौकरी करने वाले अमेरिकी नागरिकों की संख्या जुलाई में।,31,000 तक घट गई। इसका कारण सरकार द्वारा जनगणना के लिए अनुबंध के तहत रोजगार पर रखे गए लोगों को हटाना है। लेकिन इससे बेरोजगारी की दर पूर्व के 9. 5 प्रतिशत पर स्थिर रही।
निजी क्षेत्र में रोजगार पिछले महीने मात्र 71,000 बढ़ा जो उम्मीद से कम है।
श्रम विभाग ने एक बयान में आज कहा है कि गैर कृषि कार्य वाले रोजगार जुलाई में।,31,000 घटा तथा बेरोजगारी की दर 9.5 प्रतिशत बनी रही। ताजा आंकड़ों के अनुसार सरकारी रोजगार जुलाई में घट गया क्योंकि जनगणना के लिए काम पर रखे गए।,43,000 अस्थाई कर्मचारियों ने अपने काम को पूरा कर लिया। दूसरी ओर निजी क्षेत्र का रोजगार पिछले महीने लगभग 90,000 की संख्या में बढऩे की उम्मीद थी।

सोने की खान में आग लगी, 50 लोग फंसे

बीजिंग, 6 अगस्त
पूर्वी चीन स्थित शेनडांग प्रांत में सोने की एक खान में आग भड़कने के बाद कम से कम 50 लोग उसके भीतर फंस गए हैं।
चीन की सरकारी संवाद समिति शिन्हुआ ने प्रांतीय आपात विभाग कार्यालय के एक प्रवक्ता के हवाले से कहा है कि लिंगनन खान में स्थानीय समयानुसार शाम पांच बजे के आसपास आग भड़क उठी, उस समय खान में 64 लोग फंस हुए थे।
उन्होंने बताया कि 11 लोगों को सुरक्षित बचा लिया गया जबकि बाकी अभी भी फंसे हुए हैं। प्रांतीय सरकार ने राहत एवं बचाव कार्य शुरू किया है। शुरूआती जांच से पता चला है कि एक भूमिगत केबल की वजह से आग लगी।

Tuesday, August 3, 2010

खदानों में सुरक्षा उपायों में कमी से ४३ मजदूरों की मृत्यु पर बवाल

आयोग ने 43 व्यक्तियों की मौत पर लिया संज्ञान
जयपुर 3 अगस्त

राजस्थान मानवाधिकार आयोग ने भीलवा़डा जिले के बिजौलिया क्षेत्र में खदानों में सुरक्षा उपायों की कमी के कारण 43 व्यक्तियों की कथित मृत्यु श्वसन रोग से होने के बारे में प्राप्त परिवाद पर संज्ञान लिया गया।
आयोग की यहां जारी विज्ञप्ति में यह जानकारी दी गई। आयोग को मिले परिवाद में मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी, भीलवाडा से प्राप्त रिपोर्ट पर प्रकरण को आयोग द्वारा बडी गंभीरता से लिया गया तथा जिला कलेक्टर, भीलवाडा़ को आदेश दिए गए हैं कि वह खदान मालिकों को सुनवाई का अवसर देने के उपरान्त उनके खिलाफ जरूरी कानूनी कार्रवाई करें, जिनकी लापरवाही से 43 व्यक्तियों की श्वास रोग की बीमारी से मृत्यु हुई।
विज्ञप्ति के अनुसार आयोग ने भविष्य में भी खदानों में काम करने वाले मजदूरों की श्वास रोग से मृत्यु नहीं हो, इसके लिए किए गए उपाय की जानकारी देने की निर्देश दिए हैं।

४५ दिन कर्मचारी जा सकेंगे श्रम न्यायालय

कर्मचारी को श्रम न्यायालय तक पहुंच के प्रावधान वाले विधेयक को रास की मंजूरी
नई दिल्ली, ३ अगस्त

संसद की स्थाई समिति की सिफारिश को मानते हुए सरकार ने इस विधेयक में यह प्रावधान किया है कि कर्मचारी अपने मामले को सुलह प्रक्रिया में भेजे जाने के 45 दिन बाद अपने मामले को श्रम अदालत या न्यायाधिकरण में ले जा सकता है। मौजूदा कानून के तहत इसकी अवधि तीन माह है। औद्योगिक संस्थान में कार्यरत किसी कर्मचारी की बर्खास्तगी, पदावनति, छंटनी या सेवा समाप्त किए जाने की स्थिति में कर्मचारी को सीधे श्रम न्यायालय या न्यायाधिकरण में जाने का अधिकार देने के प्रावधान वाले एक विधेयक को मंगलवार को राज्यसभा ने मंजूरी दे दी।
श्रम एवं रोजगार मंत्री मल्लिकार्जुन खरगे ने 'औद्योगिक विवाद (संशोधन) विधेयक 2009' पर हुई चर्चा का जवाब देते हुए कहा कि बीस या इससे अधिक कर्मचारियों वाले औद्योगिक संस्थान में शिकायत निवारण तंत्र की स्थापना किए जाने का प्रस्ताव भी है। मंत्री के जवाब के बाद सदन ने विधेयक को ध्वनिमत से मंजूरी प्रदान कर दी।
इससे पूर्व खरगे ने कहा कि विधेयक में सुपरवाइजर की वेतन सीमा को 1600 रूपए से बढ़ाकर 10 हजार रूपए कर दिया गया है। उन्होंने कहा कि कुछ सदस्यों का सुझाव था कि इस सीमा को बढ़ाकर 25 हजार रू कर दिया जाना चाहिए।

Sunday, August 1, 2010

स्टील कंपनी में पिघला लोहा गिरने से 17 घायल

वद्धर्मान (पश्चिम बंगाल)

दुर्गापर के एक इस्पात संयत्र में आज पिघला लोहा गिरने से कम से कम 17 व्यक्ति घायल हो गए। पुलिस ने बताया कि दुर्घटना अंगदपुर औद्योगिक इलाके के अमित मेटालिक स्टील प्लांट में घटी। घायलों को एक अस्पताल में भर्ती कराया गया है।
घायलों में तीन की हालत गंभीर बताई जाती है। प्रथम दृष्टया यह सुरक्षा मानकों में कंपनी की लापरवाही का नतीजा प्रतीत होती है और मजदूरों ने भी इसके लिए कंपनी की अतिशय मुनाफाखोरी की इच्छा में सुरक्षा मानकों को लागू न करनो को जिम्मेदार ठहराया है। हालांकि अभी तक किसी के खिलाफ पुलिस ने कोई मुकदमा नहीं दर्ज किया है और ना ही किसी मुआवजे की कंपनी ने घोषणा की है।

भारतीय मजदूरों को बांग्लादेशी मजदूरों से सीख लेनी चाहिए





ढाका में सैकड़ों कपड़ा फ़ैक्ट्रियों में कामकाज बंद, मजदूर उग्र हुए, बड़ी ब्रांड के कपड़े सस्ते में बनाकर मुनाफा निचोड़ने वाली कंपनियां वाजिब वेतन देने को तैयार नहीं
ढाका, 1 अगस्त
वेतन वृद्धि की लड़ाई को दो महीने से जारी रखी हुए बांग्लादेश के कपड़ा फैक्ट्री के मजदूर अब संघर्ष को अंतिम पड़ाव पर देखना चाहते हैं। 1 अगस्त को भी बड़ी संख्या में मजदूरों की हड़ताल के कारण ढाका के नज़दीक स्थित कपड़ा बनाने वाली सैकड़ों फ़ैक्ट्रियां लगातार तीसरे दिन बंद है। बांग्लादेश में कपड़ा बनाने की फैक्ट्रियां 30 लाख लोगों को रोजगार देती हैं। मजदूर संघ वेतन को लेकर पिछले कई महीनों से प्रदर्शन कर रहे हैं और ये प्रदर्शन अब हिंसक हो गए हैं। आख़िरी बार मजदूरों की तनख़्वाह 2006 में बढ़ाई गई थी। भारत में भी स्थिति कुछ ऐसी ही है लेकिन यहां वैसा माहौल नहीं दिखता है। मजदूरों को कंपनियां लूट रही हैं और हसीना की तरह ही सोनिया सरकार भी मालिकों की भाषा बोल रही है। कम से कम इस मामले में भारतीय मजदूर वर्ग को बांग्लादेशी मजदूरों के बहादुराना संघर्ष से सीखना चाहिए।
इन फ़ैक्ट्रियों के मजदूर लगातार तीन दिन से विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। हज़ारों मजदूरों ने मुख्य राजमार्ग को बंद कर दिया। फ़ैक्ट्री मजदूरों और पुलिस के बीच लगातार झड़पों की भी ख़बरें मिली हैं।
अधिकतर मजदूर संघों ने बीते बृहस्पतिवार को सरकार की ओर से घोषित नई न्यूनतम मजदूरी (3000 टका) को अस्वीकार कर दिया है। वे 5000 टका न्यूनतम वेतन की मांग पर अड़े हुए हैं। कपड़ा निर्माताओं का कहना है कि ऐसा पहली बार है जब विरोध प्रदर्शन की वजह से कपड़ा बनाने वाली सैकड़ों फैक्ट्रियों को बंद करना पड़ा है।
ढाका में सड़क मार्ग जाम करके प्रदर्शन कर रहे हज़ारों मजदूरों को तितर-बितर करने के लिए पुलिस ने रबड़ की गोलियां चलाई और लाठियां बरसाईं। पिछले दो दिनों में और अधिक फैक्ट्रियों के मजदूर विरोध प्रदर्शन में शामिल हो चुके हैं।
कंपनियां नुकसान सहने को तैयार हैं लेकिन मजदूरों को उनका देने के लिए अभी तैयार नहीं हो पाई हैं। ढाका में कपड़ा निर्यात संघ के उपाध्यक्ष सिद्दीक़र रहमान ने बीबीसी को बताया, "अगर विरोध का यह सिलसिला जारी रहा तो कपड़ा निर्माता पश्चिमी देशों से मिले मौजूदा ऑर्डर को निर्धारित समय पर पूरे नहीं कर पाएंगे। नतीजतन उनको नए ऑर्डर नहीं मिल सकेंगे।"
कर्मचारी संघों ने चेतावनी दी है कि जब तक न्यूनतम मजदूरी को 70 डॉलर महीना (लगभग 5000 टका) नहीं कर दिया जाता, वे प्रदर्शन जारी रखेंगे।
अभी बीते बृहस्पतिवार को सरकार ने मजदूरों के वेतन में 80 फ़ीसदी की बढ़ोतरी करके 43 डॉलर (लगभग 3000 टका) कर दिया था। अभी उन्हें 1600 टका पर 12-12 घंटे काम करना पड़ रहा है। लेकिन उनके इस संघर्ष में कथित लोकतांत्रिक सरकार भी पूंजीपतियों की भाषा बोल रही है। बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने चेतावनी दी है कि मजदूरों की ओर से किए जा रहे तोड़-फोड़ को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और दोषियों के खिलाफ कार्यवाही की जाएगी।

बड़े ब्रांड बांग्लादेशी मजदूरों की मजदूरी चुरा रहे हैं

कई विदेशी ब्रैंड जैसे वॉलमार्ट, टेस्को, एच एंड एम, मार्क्स एंड स्पेंसर और ज़ारा बांग्लादेश से बनकर आए कपड़े बेचते हैं।
कपड़ा उद्योग को बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है। देश के कुल निर्यात से होने वाली 80 फ़ीसदी कमाई इसी उद्योग से आती है। बांग्लादेश में कपड़ा बनाने की चार हज़ार फैक्ट्रियां हैं जिसमें 30 लाख लोगों को रोजगार मिलता है। इनमें अधिकतर महिलाएं हैं। बांग्लादेशी कपड़ा उद्योग पर ये आरोप लगाए गए थे कि फ़ैक्ट्रियों में मजदूरों का शोषण होता है। इसके बाद कई विदेशी कंपनियों ने बांग्लादेश सरकार से कहा था कि वो मजदूरों का न्यूनतम वेतन बढ़ाए।

Saturday, July 31, 2010

लाल इमली और धारीवाल मिल को मिलेगा जीवनदान

गुरदासपुर, 31 जुलाई
जीवनदान के लिए तरस रही धारीवाल की न्यू इस्टर्न वूलन मिल व लाल इमली कानपुर के लिए बुधवार का दिन शुभ रहा। बोर्ड फॉर दी रिकंस्ट्रक्शन ऑफ दी पब्लिक सेक्टर एंटरप्राइजेज ने इन मिलों की पुनर्जीवन योजनाको मंजूर कर लिया है। इससे पहले भी दोनों मिलों को जीवनदान मिला था जिससे कोई फायदा नहीं हुआ। अब फिर से दोनों मिलों को जीवनदान मिला है। जानकारी के अनुसार बीआईसी की तरफ से भेजे प्लान में 315 करोड़ रुपये की मांग की गई है। यह राशि कर्ज के जरिए जुटाई जाएगी। प्लान के तहत 100 करोड़ से भी अधिक राशि मिलों की जमीन बेच कर इकट्ठा की जानी थी, लेकिन अब जमीन बेचने की जरूरत नहीं होगी। मिलों के लिए नई मशीनरी खरीदने, नई भर्ती करने के साथ ही कच्चा माल खरीदने के लिए राशि रखी गई है। रिवाइवल प्लान से दोनों मिलों में मौजूद 2500 के करीब स्टाफ को फायदा मिलेगा। सभी स्टाफ को वेतन, पीएफ सहित सभी अदायगी करने की भी बात कही गई है। इतना ही नहीं, वीआरएस की भी व्यवस्था रखी गई है। धारीवाल मिल के करीब 970 मुलाजिमों का, जो वेतन की मांग को लेकर संघर्ष कर रहे थे, संघर्ष खत्म हो गया। इन मुलाजिमों को कई महीनों से वेतन नहीं मिला था। धारीवाल मिल सहित गुरदासपुर निवासियों के लिए इस रिवाइवल का विशेष महत्त्‍‌व है। इस पिछड़े जिले में बेरोजगारी बहुत ज्यादा है। रिवाइवल में नई भर्ती से क्षेत्रवासियों को काफी फायदा मिलेगा। इस संबंध में धारीवाल मिल के जीएम पीके शर्मा ने बताया कि रिवाइवल प्लान वास्तव में मिल व क्षेत्र के लिए सरसाइवल है। रिवाइवल से क्षेत्र में बेरोजगारी दूर होगी, क्योंकि इसमें नई भर्ती का भी प्रावधान है। मिल में अब ऊनी कपड़ा ही नहीं सूती, फायर प्रूफ व वूलन सिल्क टेक्स्ट फाइबर भी तैयार किया जाएगा, जिसकी मांग बहुत ज्यादा है। कर्जे की वापसी संबंधी पूछे सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि तैयार कपड़ा बेच कर होने वाले मुनाफे से इसे उतार दिया जाएगा। मिल के पास बहुत सारी सरप्लस जमीन पड़ी है। जरूरत पड़ने पर इसे बेच दिया जाएगा।

बांग्लादेशी कपड़ा कामगारों की लड़ाई अब अगले दौर में

मजदूरी 5000 टका करने के लिए उग्र प्रदर्शन
ढाका 31 जुलाई

मजदूरी बढ़ाने की सरकारी पेशकश को खारिज करते हुए बांग्लादेशी कपडा मिलों के हजारों कामगारों ने उग्र प्रदर्शन किया। उन्होंने कारखानों को निशाना बनाया और राजमार्गों पर बैरीकेड खड़ा कर दिया। प्रदर्शनकारी कर्मचारियों ने नए मजदूरी ढांचे का विरोध करते हुए सड़कों पर रैलियां निकाली। कम पारिश्रमिक एवं कमजोर शर्तों के विरोध में कर्मचारियों द्वारा महीनों प्रदर्शन किए जाने के बाद एक दिन पहले सरकार ने नए वेतन ढांचे में 80 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी की है। लेकिन कामगारों की मांग 5000 टका किए जाने की थी। नई तनख्वाह 1 नवंबर से लागू की जाएगी। कुछ बड़े यूनियनों ने सरकार की इस वेतन वृद्धि को मानने की बात कही है वहीं कई यूनियनों ने इसे मानने से इनकार कर दिया है।
प्रदर्शनकारी कर्मचारियों ने प्रमुख सड़कों एवं राजमार्गों के रास्ते बंद कर दिए, वाहनों को नुकसान पहुंचाया और कई कपड़ा इकाइयों में तोडफ़ोड़ की। कर्मचारी 5,000 टका मजदूरी तय किए जाने की मांग कर रहे हैं, जबकि सरकार ने कल 3,000 टका मजदूरी की घोषणा की। अभी तक इन कामगारों को 1600 टका पर 12 12 घंटे काम करना पड़ता है।
हालांकि ढाका के पुलिस प्रमुख एकेएम शाहिदुल हक ने धमकी दी है कि 'हम उन्हें ऐसा करने नहीं देंगे.. हमारे पास कड़ा रुख अख्तियार करने के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं है। सरकार ने सड़कों पर अपराधरोधी त्वरित कार्य बटालियन की टुकडिय़ां और पुलिस को तैनात कर दिय है।
पुलिस निरीक्षक अब्दुल कैद्दुल ने यहां बताया कि करीब 5000 श्रमिकों ने शहर के मुख्य तेजगांव लिंक रोड को जाम कर दिया और समीप के दर्जनों कपड़ा फैक्ट्रियों पर हमला किया। मंगलवार को सरकार ने कहा था कि वह कपड़ा श्रमिकों की तनख्वाह 1662 टका से बढ़ाकर 3000 टका कर देगी। हालांकि कुछ श्रमिक संघों ने इसे बढ़ाकर 5000 टका करने की मांग की थी।
श्रमिकों ने सबसे ज्यादा गुस्सा गुलशन इलाके में उतारा जहां कई दूतावास एवं विदेशी सहायता संगठनों के कार्यालय हैं।
गुलशन के पुलिस प्रमुख नुरल आलम ने कहा, 'वे फैक्ट्रियों में तोडफ़ोड़ कर रहे थे, कारों को जला रहे थे और सड़कों को जाम कर रहे थे।Ó

दक्षिण भारत के ट्रक ऑपरेटर आज से अनिश्चितकालीन हड़ताल पर

नमक्कल (तमिलनाडु) 31 जुलाई
दक्षिण भारत के ट्रक ऑपरेटरों ने राजमार्गों पर टोल की दर में कमी की मांग को लेकर रविवार से अनिश्चितकालीन हड़ताल पर जाने की धमकी दी है। तमिलनाडु लॉरी ओनर्स फेडरेशन के अध्यक्ष के नल्लातंबी ने कहा कि कल आधी रात से तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और पुडुचेरी के लगभग 22 लाख ट्रक सड़कों पर नहीं दिखेंगे।
नल्लातंबी ने कहा कि अगर उनकी मांगों पर सुनवाई नहीं हुई, तो छह अगस्त से देशभर के ट्रक ऑपरेटर अनिश्चितकालीन हड़ताल पर चले जाएंगे।
उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार ट्रकों से प्रति किलोमीटर 1.45 रुपए का टोल कर लेती है, जबकि निजी एजेंसियों द्वारा संचालित टोल गेट्स पर टोल टैक्स की दर 3.45 रुपए प्रति किलोमीटर की बैठती है।

ट्रक मालिक छह अगस्त से हड़ताल पर जाने को अड़े
नई दिल्ली, 31 जुलाई
ट्रक आपरेटर छह अगस्त से अनिश्चितकालीन हड़ताल पर जाने के फैसले पर अडिग हैं। ट्रक आपरेटरों ने आज कहा कि सरकार टोल टैक्स को कम करने तथा टोल नीति पर फिर से विचार करने की मांग को पूरा करने में विफल रही है। ऐसे में वे छह अगस्त से अनिश्चितकालीन हड़ताल पर जाने के अपने फैसले पर अडिग हैं।
अखिल भारतीय मोटर ट्रांसपोर्ट कांग्रेस :एआईएमटीसी: के अध्यक्ष जी आर षणमुगप्पा ने संवाददाताओं से कहा, ै हमने छह अगस्त से अनिश्चितकालीन हड़ताल पर जाने का फैसला किया है क्योंकि वाहनों पर लगाए जाने वाले भारी भरकम टोल शुल्क को कम करने की हमारी मांग पर सरकार ने विचार नहीं किया है। करीब 62 लाख ट्रक आपरेटर एआईएमटीसी के सदस्य हैं।
इससे पूर्व सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री कमलनाथ ने कहा था कि सरकार की कोशिश है कि जनता के व्यापक हित में ट्रक मालिक छह अगस्त से हड़ताल पर न जाएं। अनिश्चितकालीन हड़ताल का आह्वान करने वाली एआईएमटीसी की मांग है कि टोल शुल्कों को युक्तिसंगत बनाया जाए। उसने टोल संग्रहण की नीति की उच्चस्तरीय जांच सीबीआई अथवा एक संसदीय पैनल से कराने की मांग की है।

मुंबई में फिर हुई गैस लीक

द्मल्याण में एक कंपनी के क्लोराइड गैस लीक हुई
मुम्बई 31 जुलाई


महाराष्ट्र में ठाणे जिले के कल्याण में एक रसायन कंपनी से गैस लीक होने के बाद कई लोगों ने आज सांस लेने की दिक्कत होने और आंखों में दर्द की शिकायत की। अग्निशमन अधिकारियों ने कहा कि कल्याण में मुरबाद रोड पर कंपनी एएस केमोफार्मा के मुख्य टैंक से क्लोराइड गैस लीक होने के कारण आसपास रहने वाले लोगों को सांस लेने में दिक्कत हुई और आंखों में दर्द हुआ। अधिकारियों के अनुसार कंपनी ने लीकेज को तुरंत बंद किया। किसी को अस्पताल में भर्ती नहीं कराया गया है।
प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के क्षेत्र अधिकारी पीडी जगताप भी कंपनी को बचाने में लगे रहे उन्होंने कहा कि हादसे स्थल का मुआयना करने के बाद कहा कि कंपनी की कोई गलती नहीं है और यह लीकेज अचानक हुई।
हाल में महानगर में गैस लीक की यह दूसरी घटना है। चौदह जुलाई को मुम्बई के सेवरी में बंबई पोर्ट ट्रस्ट के परिसर में रखे सिलेंडर से क्लोरीन गैस लीक होने से 100 से अधिक लोग बीमार पड़ गए थे।

चीन में दोहरे खदान हादसे में 17 लोगों की मौत, 24 फंसे

बीजिंग, 31 जुलाई
चीन में शिनवार को हुए दोहरे खदान हादसे में कम से कम 17 खनिकों की जान चली गई जबकि 24 अभी भी वहां फंसे हुए हैं।
स्थानीय अधिकारियों ने बताया कि उत्तर चीन के शांशी प्रांत में एक कोयला खदान में हुए एक शक्तिशाली विस्फोट में आज कम से कम 17 खनिकों की मौत हो गई जबकि 20 अन्य घायल हो गए।
शांशी प्रांत के जिस खदान में विस्फोट हुआ उसका मालिकाना हक रखने वाली कंपनी 'यांगछुआन कोल इंडस्ट्री :ग्रुप: कंपनी लिमिटेडÓ के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि विस्फोट यिचेंग क्षेत्र के लिनफेन नगर में लियुगोउ कोयला खदान में हुआ और जानमाल की हानि के आंकड़ों में इजाफा हो सकता है।
आज रात हुए एक और खदान हादसे में 24 खनिक बाढ़ प्रभावित हीलोंगजियांग प्रांत के हेंगशान जिले के जिक्सी सिटी में स्थित खदान में फंसे हुए हैं। सरकारी मीडिया में कहा गया है कि उन्हें बचाने के प्रयास किए जा रहे हैं।
गौरतलब है कि चीन में उचित सुरक्षा उपायों की कमी के कारण होने वाली खदान दुर्घटना में हर साल सैकड़ों लोग अपनी जान गंवाते हैं।
इस बीच, मध्य चीन के हूनान प्रांत की राजधानी चांग्शा सिटी में कल हुए बम विस्फोट में मरने वालों की संख्या बढ़कर चार हो गई है। यह जानकारी पुलिस ने दी।

Wednesday, July 28, 2010

पीथमपुर में ही डंप होगा कारबाइड का 347 मीट्रिक टन कचरा

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर केंद्र सरकार कर चुकी है तय, मानसून सत्र में हुआ खुलासा,
भोपाल कारबाइड में रखा है 347 मीट्रिक टन जहरीला कचरा


भोपाल, 28 जुलाई एजेंसी

आखिर केंद्र के मनसूबे साफ हो ही गए। तीन साल पहले रातों रात भोपाल के यूनियन कारबाइड के हजारों टन जहरीले कचरे को इंदौर के पास स्थित सेज पीथमपुर की एक फैक्ट्री में जला दिया गया। अदालत के फैसला आने के बाद इस मुद्दे के गरम होने के बाद पीथमपुर के आस पास के ग्रामीणों ने जहरीले कचरे के जलाए जाने के बाद भूगर्भ जल के जहरीले होने की बात उठाई और विरोध शुरू हुआ। इसके बाद केंद्र और राज्य सरकार दोनों ही इस बारे में गलत जानकारी देते रहे। हाल ही में केंद्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश भी उस गांव का दौरा किया था और आश्वासन दिया था कि अब आगे से यहां कचरा नहीं जलाया जाएगा। लेकिन मंगलवार को संसद के मानसून सत्र में केंद्र सरकार अपना मंतव्य साफ कर ही दिया।
भोपाल गैस त्रासदी के बाद से यूनियन कारबाइड के बंद पड़े कारखाने में 347 मीट्रिक टन जहरीला रासायनिक कचरा पड़ा हुआ है, जिसके निष्पादन का निर्णय पीथमपुर स्थित 'ट्रीटमेंट, स्टोरेज एण्ड डिस्पोजल फैसिलिटीÓ (टीएसडीएफ) में किया गया है। यह जानकारी आवास एवं पर्यावरण मंत्री जयंत मलैया ने मंगलवार को राज्य विधानसभा में कांग्रेस की कल्पना परूलेकर के एक लिखित प्रश्न के जवाब में दिया। उन्होंने कहा कि इस कचरे में 96 मीट्रिक टन सेविन एवं नफ्थाल रेसिड्यू, 30 मीट्रिक टन रिएक्टर रेसिड्यू, 56 मीट्रिक टन सेमीप्रोसेस्ड पेस्टीसाइड्स एवं 165 मीट्रिक टन एस्केवेटेड वेस्ट शामिल है।
इसी बीच माकपा ने कहा है कि वह इस सत्र में भोपाल कांड का मुद्दा प्रमुखता से उठाएगी। माकपा नेता सीताराम येचुरी ने कहा, 'डाउू केमिकल्स पर परमाणु कचरा साफ करने की जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए। अमेरिका के साथ भारत की सामरिक साझेदारी है, ऐसे में उसे राष्ट्रपति बराक ओबामा के उस फैसले से सबक लेना चाहिए, जिसमें ब्रिटिश पेट्रोलियम पर खाड़ी में तेल बहने के मामले में भारी मुआवजा देने के लिए कहा गया था।Ó
आवास एवं पर्यावरण मंत्री ने कहा कि इस कचरे को नष्ट करने के लिए आवास एवं पर्यावरण विभाग ने अलग से कोई नीति तय नहीं की है और किसी कंपनी को इसका ठेका भी नहीं दिया है। यह प्रश्न मूलत: गैस राहत विभाग से संबंधित है, लेकिन विभाग को मिली जानकारी के अनुसार यह कचरा पीथमपुर (धार) स्थित टीएसडीएफ में ले जाने का निर्णय सुप्रीम कोर्ट के आदेश के परिप्रेक्ष्य में लिया गया है।
मलैया ने कहा कि प्रदेश के समूचे खतरनाक कचरे को नष्ट करने के लिए इस एकमात्र टीएसडीएफ का निर्माण राज्य औद्यौगिक विकास निगम, पीथमपुर ऑटो क्लस्टर लिमिटेड एवं मेसर्स रामकी एनवायरो इंजीनियरिंग लिमटेड द्वारा किया गया है।
कल्पना द्वारा यह पूछने पर कि इस कचरे के दुष्प्रभावों को कम करने एवं इसे नष्ट करने के लिए विभाग ने कितनी राशि खर्च की है तथा कचरे से कौन-से प्रभाव मानव शरीर के विरुद्ध राज्य प्रदूषण नियंत्रण मंडल ने चिह्नित किए हैं, आवास एवं पर्यावरण मंत्री ने कहा कि इस बारे में विभाग ने कोई राशि खर्च नहीं की है, इसलिए शेष प्रश्न उपस्थित नहीं होता है।

श्रमिकों की खराब स्थिति पर दक्षिणपंथी ट्रेड यूनियन को चिंता !

बीकानेर, 28 जुलाई
भारतीय मजदूर संघ श्रमिकों की खराब स्थिति के कारण राजस्थान में पनप रहे नक्सलवाद एवं माओवाद पर चिंता व्यक्त की है।
भारतीय मजदूर संघ प्रदेश कार्य समिति की बैठक में अखिल भारतीय असंगठित मजदूर संघ के राष्ट्रीय महामंत्री के.लक्ष्मा रेड्डी ने कहा कि नक्सलवाद और माओवाद की जड़ें दिल्ली तक जम चुकी है। देश में श्रमिकों को न्याय नहीं मिल रहा है।
प्रदेश मंत्री गौरीशंकर व्यास ने कहा कि असंगठित मजदूरों को एकजुटता दिखाने की आवश्यकता है। जब तक मजदूर एक नहीं होगा तब तक उसका हक मिलना नामुमकिन है।

हालांकि यह अलग बात है कि देश में मजदूरों की दयनीय हालत के लिए ये ही ट्रेड यूनियनें जिम्मेदार हैं।

इराक जाने वाले मजदूरों से प्रतिबंध हटा सकता है नेपाल

काठमांडो 28 जुलाई

नेपाल सरकार काम की तलाश में इराक जाने वाले मजदूरों से संभवत: प्रतिबंध हटा लेगी। नेपाली विदेश मंत्रालय के सूत्रों ने बताया कि विदेश सचिव मदन कुमार भटराई ने तत्काल प्रतिबंध हटाने की सिफारिश की है लेकिन इसके लिए श्रम मंत्रालय से हरी झंडी मिलने का इंतजार किया जा रहा है।
सूत्रों ने बताया कि श्रम मंत्रालय संभवत: एक-दो दिन में प्रतिबंध हटा लेगा। वर्तमान में इराक में 40 हजार से अधिक नेपाली मजदूर अवैध माध्यमों के जरिए काम कर रहे हैं।
मंत्रालय के एक उच्च पदस्थ अधिकारी ने बताया कि इराक में इस समय नेपाल का राजनयिक मिशन नहीं है ्र इसलिए विदेश मंत्रालय पाकिस्तान स्थित अपने दूतावास के जरिए मजदूरों की समस्याओं से संबंधित मुद्दों को देखेगा।
बगदाद में एक आतंकी समूह द्वारा 12 नेपाली मजदूरों की हत्या कर दिए जाने के बाद अगस्त 2006 में नेपाल सरकार ने मजदूरों के इराक जाने पर रोक लगा दी थी। उल्लेखनीय है कि इराक में मजदूरों के मारे जाने के बाद नेपाल में दंगे भड़क उठे थे।

केरल ने रोजगार गारंटी योजना के तहत मजदूरी बढाने की मांग की

तिरूवनंतपुरम, 28 जुलाई
केरल ने राज्य में जीवन स्तर के मानकों पर विचार करते हुए केन्द्र से राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना के तहत काम कर रहे मजूदरों की मजदूरी बढाने की मांग की।
स्थानीय प्रशासन मंत्री पलोली मोहम्मद कुट्टी ने प्रश्न काल के दौरान विधानसभा में कहा कि राज्य इस बारे में पहले ही केन्द्र को लिख चुका है लेकिन अभी उसे कोई जवाब नहीं मिला है।
उन्होंने कहा कि अगर कोई पंचायत धान के खेतों को भरकर विकसित की गई जमीनों पर घर बनाने की अनुमति देती है तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
सरकार ने इसके पर्यायवरण और खाद्य सुरक्षा पर बुरे प्रभाव को देखते हुए धान के खेतों पर दावे की जांच करने के लिए कुछ कठोर नियम लागू किए हैं।

मजदूरों के साथ बलवा करने वाले छह पुलिस कर्मी गिरफ्तार

डीबी पावर प्लांट में ग्रामीणों और मजदूरों के साथ की थी मारपीट
रायगढ़ 28 जुलाई

छत्तीसगढ के जांजगीर चांपा जिले में डीबी पावर प्लांट के छह सुरक्षा कर्मियों को पुलिस ने ग्रामीणों एंव मजदूरों के साथ बलवा और मारपीट करने के मामले में गिरफ्तार कर लिया है।
पुलिस अधिकारियों ने आज बताया कि डी बी पावर प्लांट के इन सभी छह सुरक्षा कर्मियों को 5-5 हजार रूपए की जमानत पर कल शाम डभरा थाने से रिहा कर दिया गया। डभरा पुलिस ने अवधराम महिलाने की रिपोर्ट पर पृथ्वीराज सिहं सहित छह सुरक्षा कर्मियों के विरूद्ध मामला दर्ज किया था। इन सशस्त्र सुरक्षा कर्मियों पर दर्ज प्राथगिकी में आरोप है कि 5 जुलाई को बारादर निर्माणाधीन 1200 मेगावाट के डीबी पावर प्लांट में भूमि अधिग्रहण का मुआवजा और नौकरी की मांग कर रहे ग्रामीणों के साथ मारपीट की। इसमें बारह ग्रामीणों को चोटे आई।
पुलिस ने डीबी पावर प्लांट के महाप्रबन्धक राजीव गुप्ता की रिपोर्ट पर 5 जुलाई को 178 ग्रामीणों एंव मजदूरों के विरूद्ध तोड़ फोड़ और लूट-पाट का गैरजमानती मामला दर्ज किया।

चीन में फैक्टरी में विस्फोट, 12 मरे

बीजिंग, 28 जुलाई
पूर्वी चीन की एक प्लास्टिक और रसायन फैक्टरी में गैस पाइपलाइन से गैस का रिसाव होने के बाद हुए जोरदार धमाके में कम से कम 12 लोगों की मृत्यु हो गई और 300 अन्य लोग घायल हो गए। जियांगसू प्रांत की राजधानी नानजिंग शहर में लगी आग ने फैक्टरी को मलबे में तब्दील कर दिया और आस-पास के भवनों को भी क्षतिग्रस्त कर दिया।
घायलों को जिन स्थानीय अस्पतालों में पहुंचाया गया वहां रक्त की कमी हो गई और अधिकारियों ने लोगों से रक्तदान करने की अपील की। सरकारी टेलीविजन ने बताया कि 12 लोगों की मृत्यु हुई। इससे पहले, सरकारी शिन्हुआ संवाद समिति ने मरने वालों की संख्या छह बताई थी। बेकार प्लास्टिक और रसायन की फैक्टरी में सुबह दस बजकर 10 मिनट पर हुआ यह धमाका इतना जोरदार था कि 300 मीटर की दूरी तक के मकानों की खिड़कियां और दरवाजों के परखच्चे उड़ गए। विस्फोट की आवाज सुनकर लोग अपने घरों से भाग निकले।
स्थानीय लोगों ने बताया कि उन्हें भूकंप के झटके की तरह महसूस हुआ और जोरदार आवाज सुनाई पड़ी। अनेक लोग भूकंप आने की बात समझकर अपने घरों से बाहर निकल आए ।

जुझारू संघर्ष से बांग्लादेशी कपड़ा मजदूरों ने जीती न्यूनतम वेतन बढ़ाने की लड़ाई


वर्तमान मजदूरी- 1622 टका सरकार राजी- 3000 टका, मजदूरों की मांग-5000 टका की
बुधवार, जुलाई 28

आखिर बांग्लादेश के कपड़ा फैक्ट्रियों में काम करने वाले मजदूरों ने वेतन बढोत्तरी की जंग जीत ली है। हालांकि यह अभी यह आंशिक ही सफलता कही जाएगी क्योंकि ट्रेड यूनियनों ने पांच हजार टका की मांग रखी थी जबकि सरकार तीन हजार देने पर राजी हुई है। इससे पहले उन्हें बमुश्किल डेढ़ से दो हजार टका न्यूनतम मजदूरी मिलती थी।
बांग्लादेश में अधिकारियों ने कहा है कि कपड़ा फ़ैक्ट्रियों में काम करने वाले कर्मचारियों का वेतन दोगुना किया जाएगा। वेतन को लेकर कर्मचारी पिछले कई महीनों से प्रदर्शन कर रहे हैं और ये विरोध प्रदर्शन हिंसक भी हो गया था.पहले मज़दूरों को हर महीने 1622 टका (25 डॉलर) मिलते थे पर अब ये राशि बढ़कर तीन हज़ार हो जाएगी। बेहतर वेतन और काम करने के हालात को लेकर मज़दूरों और पुलिस के बीच कई बार झड़पे हुई हैं। पिछले महीने विरोध प्रदर्शन के बाद करीब 250 कपड़ा फ़ैक्ट्रियाँ बंद कर दी गई थीं।
कर्मचारी चाहते थे कि वेतन पाँच हज़ार टका कर दिया जाए। आख़िरी बार तनख़्वाह 2006 में बढ़ाई गई थी। कई विदेशी ब्रैंड बांग्लादेश से बनकर आए कपड़े बेचते हैं जैसे वॉलमार्ट, टेस्को, एच एंड एम, मार्क्स एंड स्पेंसर और ज़ारा। कपड़ा उद्योग को बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है। देश के कुल नियार्त से होने वाली 80 फ़ीसदी कमाई इसी उद्योग से आती है।

विरोध प्रदर्शन

बांग्लादेशी कपड़ा उद्योग पर ये आरोप लगाए गए थे कि फ़ैक्ट्रियों में मज़दूरों का शोषण होता है। इसके बाद कई विदेशी कंपनियों ने बांग्लादेश सरकार से कहा था कि वो मज़दूरों का न्यूनतम वेतन बढ़ाए। सरकारी अधिकारियों, यूनियन नेताओं और उद्योग से जुड़े लोग वेतन बढ़ाने पर कुछ समय से बातचीत कर रहे थे। न्यूनतम वेतन सरकारी बोर्ड के प्रमुख ने एएफ़पी को बताया है कि न्यूनतम वेतन तीन हज़ार टका होगा जिसमें मेडिकल और हाउसिंग भत्ता शामिल है। एक यूनियन अधिकारी ने बताया है कि ये प्रस्ताव मान लिया गया है हालांकि ये स्पष्ट नहीं है कि सभी यूनियन इसे मानेंगी या नहीं। इससे करीब 25 लाख मज़दूर प्रभावित होंगे।

Tuesday, July 27, 2010

तस्वीरों में आज




१-सोयेपुर (वाराणसी) में अगरबत्ती बनाते बच्चे।
२-मंगलवार को पटना में एआईसीटीयू के बैनरतले नीतीश सरकार की नीतियों का विरोध करते ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता।

ठेकेदार ने मजदूर को पीट पीट कर हत्या की

लखनऊ, 27 जुलाई
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के चिनहट थाना क्षेत्र में २६ जुलाई-दिन सोमवार को लेन देन के विवाद को लेकर नशे में धुत एक ठेकेदार ने मजदूर की पीट-पीट कर हत्या कर दी और फरार हो गया। पुलिस सूत्रो ने बताया एक कंपनी के ठेकेदार ने अपने मजदूर से पैसे के लेन देने को लेकर हुए विवाद के बाद उसके सिर पर तसले से प्रहार कर दिया जिससे उसकी मौके पर ही मृत्यु हेा गई। ठेकेदार इस वारदात को अंजाम देकर फरार हो गया।
मृत मजदूर के साथियों ने ठेकेदार के खिलाफ नामजद प्राथमिकी पुलिस में दर्ज कराई है। पुलिस ठेकेदार की गिरफ्तारी का प्रयास कर रही है।

दिल्ली में 8 मजदूरों को कुचलने वाला मेडिकल का छात्र गिरफ्तार

चार मजदूरों की मौत, चार गंभीर
ठेकेदार की चूक सामने आई, सड़क पर लगा रखा था कारपेंटर मजदूरों को

नई दिल्ली, 27 जुलाई
दक्षिण दिल्ली में अपनी तेज गति वाली कार से आठ मजदूरों को कुचलने वाले मेडिकल के एक छात्र को मंगलवार को उस वक्त गिरफ्तार कर लिया गया, जब वह देश छोड़कर भागने की कोशिश कर रहा था। इस हादसे में चार मजदूरों की मौत हो गई है।
राजस्थान के अलवर जिला निवासी शाहिद को यहां हवाई अड्डे पर गिरफ्तार कर लिया गया। वह यूक्रेन से एमबीबीएस कर रहा है।
शाहिद द्वारा कथित रूप से चलाई जा रही होंडा सिटी कार ने २६ जुलाई को तड़के सफदरजंग फ्लाईओवर के पास आठ मजदूरों को रौंद दिया था। इस हादसे में चार मजदूरों की मौत हो गई है जबकि एक महिला सहित चार अन्य मजदूर घायल हो गए। यह लोग सड़क की मरम्मत का कार्य कर रहे थे।
शाहिद दुर्घटना के बाद घटनास्थल से फरार हो गया। यह शक जताया गया है कि उसने शराब पी रखी थी।
पुलिस ने बताया कि वह अपने दो दोस्तों शाहजाद :18: और आलम खान:23: के साथ महरौली के अउला गांव स्थित आलम के घर में पार्टी में शामिल होने के बाद लौट रहा था, तभी रात के दो बजे यह हादसा हुआ। पता चला है कि उन्होंने १२ बोतल बीयर पी रखी थी और शाहिद एक महीने की छुट्टी पर भारत आया था। लेकिन दुर्घटना होने के मंगलवार को देश छोड़कर भागने की योजना बना ली।

6 अगस्त से अनिश्चितकालीन हड़ताल पर ट्रक आपरेटर

ऑल इंडिया मोटर ट्रांसपोर्ट कांग्रेस के आह्वान पर 62 लाख ट्रक सड़कों से होंगे नदारद
नई दिल्ली, 27 जुलाई
वर्तमान टोल नीति के विरोध तथा टोल कर की दरों में कमी की मांग को लेकर ट्रक आपरेटरों ने आगामी छह अगस्त से हड़ताल पर जाने की धमकी दी है। ऑल इंडिया मोटर ट्रांसपोर्ट कांग्रेस (एआईएमटीसी) ने कहा कि ६ अगस्त से करीब 62 लाख ट्रक सड़कों से हट जाएंगे। जिससे देशभर में माल का आवागमन ठप हो जाएगा। एआईएमटीसी ने कहा कि 'गलतÓ टोल नीति से उन्हें रोजाना 5,000 करोड़ रुपए का नुकसान हो रहा है।
एआईएमटीसी के अध्यक्ष जी आर षणमुगप्पा ने यहां संवाददाताओं से कहा,'एआईएमटीसी की प्रबंधन समिति को यह कड़ा कदम इसलिए उठाने पर मजबूर होना पड़ रहा है, क्योंकि सरकार बार-बार मांग किए जाने के बावजून टोल संग्रहण को तर्कसंगत बनाने में विफल रही है।Ó
एआईएमटीसी टोल शुल्क तथा डीजल कीमतों को तर्कसंगत बनाने तथा टायरों पर डंपिंग रोधी शुल्क हटाने की मांग कर रही है।
षणमुगप्पा ने कहा कि हमने अपने फैसले के बारे में सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय को अवगत करा दिया था, पर इसके बावजूद सरकार इस मसले को सुलझाने में असफल रही है।

Monday, July 26, 2010

पूर्वी दिल्ली में घरेलू नौकर ने आत्महत्या की

नई दिल्ली, 25 जुलाई
पूर्वी दिल्ली में एक घरेलू नौकर ने अपनी खराब माली हालत और गुलामी जैसी जिंदगी से परेशान होकर सोमवार को अपने मालिक के घर में आत्महत्या कर ली। एक पुलिस अधिकारी के अनुसार घरेलू नौकर विपिन (25) का शव यहां न्यू अशोक नगर में अपने मालिक चंदन सिंह के घर पर लटका हुआ मिला। इस घर में नहीं रहने वाले सिंह आज सुबह यह देखने आए थे कि सब कुछ ठीकठाक है या नहीं, तब उन्हें उसकी लाश मिली।
सिंह तुरंत विपिन को नजदीक के अस्पताल ले गए जहां डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।
विपिन की महज दो महीने पहले ही शादी हुई थी। उसकी पत्नी उत्तर प्रदेश के फतेहपुर में उसके पैतृक गांव में है।
अधिकारी के अनुसार विपिन ने हाल ही सिंह से 15000 रुपए उधार लिए थे लेकिन उसके परिवार वाले उससे और पैसे की मांग कर रहे थे। राजधानी क्षेत्र में लाखों की तादात में घरेलू मजदूर काम कर रहे हैं लेकिन उनकी सामाजिक सुरक्षा के लिए सरकार ने कोई इंतजाम नहीं किया है। कई जगह तो स्थिति इतनी बुरी है कि इनके साथ गुलामों जैसा व्यवहार किया जाता है। ज्यादातर घरेलू नौकर नाबालिग और लड़कियां होती हैं। बाल श्रम पर प्रतिबंध लगने के बावजूद इनकी तादात काफी ज्यादा है।

Sunday, July 25, 2010

क्या घरेलू महिलाओं की हालत वेश्याओं और भिखारियों जैसी नहीं है

वेश्याओं, भिखारियों से गृहिणियों की तुलना करने पर सरकार की खिंचाई
संदीप राऊजी

अंततः यह साफ हो गया कि भारत का शासक वर्ग की नजरों में घरेलू औरतों की क्या इज्जत है। वैसे तो कई विद्वानों ने गृहस्थी को संस्थागत वेश्यावृत्ति का नाम दिया है और दुनिया के हर पूंजीवादी समाजों पर समान रूप से लागू होता है लेकिन भारतीय पूंजीवादी शासक पहली बार एक्सपोज हुआ। जनगणना में भारत सरकार ने घरेलू महिलाओं को भिखारी और वेश्याओं के समान कहा है जो कोई श्रम नहीं करती हैं और बैठे ठाले देश की धरती पर बोझ हैं। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने भारत सरकार को इस पर लताड़ लगाई है लेकिन क्या वाकई इस देश में और दक्षिण एशिआई देशों में ऐसी स्थित नहीं है। सिर्फ यहीं क्यों नहीं सभी देशों में यही स्थित है। अब जरा खबर पर नजर दौड़ाते हैं....
सुप्रीम कोर्ट ने २३ जुलाई को जनगणना में गृहिणियों को वेश्याओं, भिखारियों और कैदियों के साथ एक सूची में रखने और आर्थिक रूप से उन्हें गैर-उत्पादक श्रमिक बताए जाने के लिए सरकार की खिंचाई की है। होममेकर यानी हाउस वाइफ महिलाओं की तुलना ऐसे वर्ग से किए जाने पर आपत्ति जताते हुए न्यायालय ने कहा कि यह रवैया महिलाओं के खिलाफ लैंगिक पूर्वाग्रह का संकेतक है।
न्यायालय ने संसद से मोटर वाहन कानून की समीक्षा करने को कहा ताकि दुर्घटना की स्थिति में गृहिणी की मौत होने पर परिवार के सदस्यों को उचित मुआवजा मिल सके और लैंगिक पूर्वाग्रह को टाला जा सके।
पीठ ने अलग लेकिन समरूपी फैसलों में वैवाहिक कानूनों में भी संशोधन किए जाने का सुझाव दिया ताकि महिलाओं को समाज में उन्हें यथोचित दर्जा हासिल हो सके।
न्यायालय ने कहा कि जनगणना के कार्य में भी यह स्तब्धकारी भेदभाव मौजूद है। 2001 की जनगणना में ऐसा प्रतीत होता है कि जो खाना पकाने, बर्तन साफ करने, बच्चों की देखभाल करने, पानी लाने, जलावन एकत्र करने जैसे घरेलू काम करती हैं उन्हें गैर श्रमिक वर्ग में शामिल किया गया है। उनकी तुलना भिखरियों, वेश्याओं और कैदियों के साथ की गई है तथा जनगणना के अनुसार वे आर्थिक रूप से उत्पादक कार्य में शामिल नहीं हैं।
यह खबर भले ही घरेलू महिलाओं के बारे में हमारी सोच में बदलाव का संकेत है लेकिन वास्तविक स्थिति के बारे में सचेत भी कर रही है। शायद इसे डिसआनर किलिंग से जोड़ कर भी देखा जाना चाहिए।

बाल्को चिमनी हादसा, सीइओ को नोटिस

23 दिसंबर 2010 की शाम निर्माणाधीन चिमनी के गिरने से 40 मजदूरों की हुई थी मृत्यु
कोरबा, 23 जुलाई

छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले में अदालत ने बाल्को चिमनी हादसा मामले में बाल्को के मुख्य कार्यपालक अधिकारी को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
कोरबा के अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायालय ने आज बाल्को के मुख्य कार्यपालिक अधिकारी गुंजन गुप्ता को नोटिस जारी कर 31 जुलाई तक इस मामले में अपना जवाब प्रस्तुत करने के लिए कहा है।
जिला मुख्यालय स्थित अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायालय में आज बाल्को हादसा मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने गुप्ता को इस महीने की 31 तारीख तक जवाब प्रस्तुत करने के लिए कहा।
कोरबा जिले के बाल्को क्षेत्र में पिछले साल 23 सितंबर की शाम निर्माणाधीन विद्युत संयंत्र की चिमनी गिरने से इसमें दबकर 40 लोगों की मौत हो गई थी।
हादसे के बाद पुलिस ने इस मामले में बाल्को के उपाध्यक्ष विरल मेहता और चिमनी निर्माण करने वाली चीनी कंपनी के अधिकारियों समेत नौ लोगों को गिरफ्तार किया था। अभी सभी अधिकारी जमानत पर रिहा हो गए हैं।
इधर राज्य शासन ने इस मामले की न्यायायिक जांच भी शुरू कर दी है तथा जांच के लिए एक सदस्ईय आयोग का गठन किया गया है। मामले की न्यायायिक जांच जारी है।

Saturday, July 24, 2010

गुजरात में रसायन फैक्ट्री में धमाके में दो मजदूरों की मौत

अहमदाबाद, 24 जुलाई

गुजरात के भरूच जिले में एक रसायन फैक्ट्री के भाप रिएक्टर में हुए धमाके में दो लोगों की मौत हो गई जबकि सात अन्य घायल हो गए। पुलिस ने शनिवार को बताया कि मृतकों की शिनाख्त प्रेम सतनारायण (28) और राजकुमार मंडल (30) के रूप में हुई है। दोनों ही प्रवासी मजदूर हैं और उत्तरी बिहार से यहां कमाने आए थे।
पुलिस ने कहा कि यह घटना कल अंकलेश्वर औद्योगिक क्षेत्र में स्थित उमा रसायन फैक्ट्री में हुई।
घायलों को जयाबेन मोदी अस्पताल में भर्ती कराया गया है जबकि एक घायल को वड़ोदरा जिला अस्पताल में भेजा गया है।
उन्होंने बताया कि इस घटना को लेकर मामला दर्ज कर लिया गया है और आगे की जांच जारी है।

कलपुर्जे की कंपनी में काम करने वाले 200 से ज्यादा मजदूर बीमार

कांचीपुरम :तमिलनाडु:, 24 जुलाई
यह है देश के औद्योगिक इलाकों में मजदूरों का हाल। औद्योगिक दुर्घटनाओं में पिछले कुछ समय से तेजी आई है लेकिन फिर भी औद्योगिक इकाइयां सुरशक्षा मानकों को मानने से परहेज कर रही हैं। शुक्रवार को श्रीपेरूमबुदूर के पास स्थित इलेक्ट्रॉनिक कल पुर्जे बनाने वाली कंपनी में 200 से ज्यादा मजदूर बीमार हो गए। कंपनी के अनुसार शनिवार को यहां किए गए कीटनाशक का छिड़काव कारण मजदूरों की हालत बिगड़ी।
अस्पताल सूत्रों ने कहा कि सभी मरीज खतरे से बाहर हैं। कलपुर्जे बनाने वाली कंपनी फॉक्सकन लगभग एक साल से बंद थी और हाल ही में फिर से खुली थी।
पुलिस ने कहा कि शुक्रवार को दिन की पाली में करीब 120 मजूदरों को कुछ दिक्कतें महसूस हुईं और उन्हें निगरानी में रखा गया जबकि इतनी ही संख्या में रात की पाली में मजदूरों को भी अस्पताल में भर्ती कराया गया।

जल विद्युत परियोजना के सुरंग को साफ करने के लिए ठेके का कर्मचारी भेजा

तीन किमी लंबी सुरंग में तेज धारा में बहने के बाद भी जिंदा निकला,
इडुकी, केरल, 24 जुलाई


कालार में चल रही जल विद्युत परियोजना की तेज प्रवाह वाले पानी से भरी सुरंग में घंटों फंसे रहने के बाद एक कर्मचारी जिंदगी और मौत के बीच से जूझ कर किसी तरह बाहर निकला। प्रबंधन इस बात का जवाब नहीं दे पा रहा है कि बिना सुरक्षा व्यवस्था के एक ठेके के कर्मचारी को कैसे सुरंग साफ करने के लिए भेज दिया गया।
जानकारी के अनुसार बेनी थामस (39) जो केरल राज्य बिजली विभाग में अस्थाई कर्मचारी के पद पर काम करता है कल अपने कुछ साथी कर्मचारियों के साथ जल से भरी सुरंग की सफाई का काम कर रहा था।
बेनी के तीन किलोमीटर लंबी सुरंग की सफाई का काम इसके उद्घाटन के पहले किया जा रहा था। इसी दौरान वह फिसल कर इसमें फंस गया। जिस समय वह सफाई कर रहा था उसे बचाव व सुरक्षा के समुचित उपकरण नहीं दिए गए थे।
इससे पहले कि उसके साथी कर्मचारी उसे बचाने का प्रयास करते वह पानी की तेज धार के साथ बहता चला गया। घंटों उसमें फंसे रहने के बाद मामूली चोट के साथ बाहर आए बेनी के लिए यह बताना मुश्किल था कि कैसे उसने उस दौरान जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष किया।
नेदुमकंदम के अस्पताल में भर्ती बेनी ने बताया 'मैं तेज प्रवाह की धारा के साथ चार मीटर की गोलाई वाली सुरंग में बहता चला गया। मैं सुरंग में मौजूद चट्टानों को पकड़कर अपने को बहने से बचाने की कोशिश कर रहा था लेकिन पानी के तेज बहाव के कारण मैं इसमें सफल नहीं हो पा रहा था।Ó
उसने कहा 'थोड़े समय के लिए तो मुझे लगा कि सब कुछ खत्म हो गया। लेकिन मैंने संघर्ष करना नहीं छोड़ा। तभी मुझे सुरंग के आखिरी सिरे से आती रौशनी की किरण दिखाई पड़ी जो मेरे लिए जिंदगी की उम्मीद थी।Ó

बाल श्रम का इस्तेमाल करने वाले उत्पादों की अमेरिकी सूची में भारतीय कपड़ा क्षेत्र भी

नई दिल्ली-वाशिंगटन, 24 जुलाई
आखिर अमेरिका ने भारत के कपड़ा निर्यातकों को उन देशों की सूची में डाल ही दिया जिसमें कपड़ा उद्योग में बाल श्रम का इस्तेमाल करने वाले देश आते हैं। हालांकि इसका विरोध भारतीय कपड़ा निर्यातक संघ ने किया था लेकिन इस सच्चाई को वह झुठलाने में नाकाम रहा। अमेरिका ने लगातार दूसरे साल उन देशों की सूची में भारत को शामिल किया है, जो निर्यात उत्पादों के उत्पादन में संभवत: बाल श्रमिकों को लगाते रहे हैं। अमेरिका द्वारा इस सूची में शामिल किए जाने से परिधान निर्यातकों की प्रतिष्ठा को झटका लगा है।
लेकिन इसमें भारत के दबाव के चलते कालीन उद्योग को अमेरिका शामिल नहीं किया है जोकि बाल श्रमिकों को इस्तेमाल करने वाला एक बड़ा क्षेत्र है। अमेरिकी श्रम विभाग की उस सूची में जहां उत्पादन में संभवत बाल श्रमिकों का इस्तेमाल हुआ है, कालीन उद्योग को शामिल नहीं किया गया है। पर देश के कपड़ा उद्योग को इस सूची में रखा गया है।
हालांकि, इससे भारत के अमेरिका को तीन अरब डालर के कपड़ा निर्यात पर शुरू में कोई असर पडऩे की संभावना नहीं है। लेकिन इससे देश के कपड़ा उद्योग की प्रतिष्ठा को वैश्विक खरीदारों मसलन वॉल-मार्ट, गैप तथा जे सी पेनी से आगे आघात लगने का अंदेशा है।
बाल श्रम जैसे अमानवीय कृत्य की पैरवी करने के लिए देश का एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल कपड़ा मंत्री दयानिधि मारन की अगुवाई में अगस्त के तीसरे हफ्ते में अमेरिका जा सकता है। यह प्रतिनिधिमंडल अमेरिकी अधिकारियों को भारतीय कपडा उद्योग द्वारा बाल श्रम के इस्तेमाल को रोकने के लिए उठाए गए कदमों की जानकारी देगा। मतलब साफ है अमेरिका से बाल श्रम इस्तेमाल करने की छूट लेने की भारत कोशिश करेगा। यद्यपि कि अमेरिका इतना पाक साफ नहीं है कि वह बाल श्रम को अवैध घोषित कर दे क्योंकि वही इन उत्पादों का सबसे बड़ा खरीदार है।

रूस में खदान में मीथेन धमाके में एक खनिक की मौत

मास्को, 24 जुलाई
रूस की कोयले की एक खदान में मीथेन गैस के कारण आज तड़के हुए विस्फोट में एक खनिक की मौत हो गई जबकि बुरी तरह झुलसे दो अन्य लोग अस्पताल में भर्ती हैं।
आपात स्थिति मंत्रालय के प्रवक्ता वैलरी कोर्चागिन ने बताया कि अचानक मीथेन गैस जमा होने से विस्फोट हुआ। विस्फोट के समय 66 खनिक खदान में थे। उनमें से 65 को निकाला गया।
अभी स्पष्ट नहीं है कि घायलों को कितनी चोट आई है।
अधिकारियों ने बताया कि बचाव कार्य शुरू कर दिया गया है। इंटरफैक्स संवाद समिति ने आपदा स्थिति मंत्रालय की प्रवक्ता के हवाले से खबर दी है , ''स्थानीय समयानुसार तड़के दो बजे केमोरोवो क्षेत्र में क्रास्नोगोर्सकाया कोयले की खदान में एक धमाका हुआ। यह क्षेत्र मास्को से करीब साढे तीन हजार किलोमीटर पूर्व में स्थित है।ÓÓ
उन्होंने कहा कि धमाके के समय 67 लोग खान में कार्यरत थे। 52 लोगों को सुरक्षित निकाल लिया गया है जबकि दो लोग झुलस गए हैं जिन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया है। छह बचाव और राहत दलों को घटनास्थल रवाना कर दिया गया है।

Friday, July 23, 2010

जिनके दम पर रोशन है यह खेलों का संसार


11 जून को अफ्रीका के जोहान्सवर्ग शहर में फीफा विश्व कप का भव्य आयोजन हुआ। इसी दिन 140 देशों के मानव अधिकार कार्यकर्ताओं, टे्रडयूनियनों और कई अन्य संगठनों ने बाल मजदूरी के खिलाफ अपने-अपने देशों में प्रदर्शन किया। ऐसे प्रयासों के बावजूद फुटबाल उद्योग मे बाल मजदूरी और बंधुआ मजदूरी का चलन जारी है। फुटबाल उद्योग में बाल मजदूरी के विभिन्न पहलुओं की पड़ताल करती रिपोर्ट----
भारत में बच्चों से काम लेना साधारण सी बात मानी जाती है। लेकिन समाज में शिक्षा बढऩे के साथ ही लोगों की सोच में भी बदलाव आया है। पाकिस्तान के बंधुआ मजदूरों के ऊपर 1995 की एक रिपोर्ट ने वहां के फुटबाल उद्योग में बड़े पैमाने पर बाल मजदूरों और बंधुआ मजदूरों के इस्तेमाल का खुलासा किया था। यह पहली रिपोर्ट थी जिसनें खेलों की रंग-विरंगी दुनिया के पर्दे के पीछे की वीभत्स तस्वीर को सामने कर दिया था। तथाकथित राष्ट्रवादियों के पाकिस्तान के खिलाफ दुष्प्रचार के लिए यह एक बेहतरीन सामग्री थी और इसका वे बड़े पैमाने पर इस्तेमाल भी कर सकते थे क्योंकि इस खबर का अंतर्राष्ट्रीय महत्व था। बहरहाल उनकी इस खुशी को काफूर होते ज्यादा वक्त नहीं लगा क्योंकि उसके तुरन्त बाद ही फुटबाल उद्योग और खेल सामग्री के निर्यात के दूसरे सबसे बड़े बाजार भारत के ऊपर ही गाज गिर गयी। तभी से फुटबाल उद्योग में बाल श्रम के इस्तेमाल से सम्बन्धित यह मुद्दा समय-समय पर मीडिया और स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा उठाया जाता रहा है। इतने प्रयासों के बाद भी इस उद्योग में बाल श्रम का अभी भी उपयोग जारी है।साउथ एशियन कोलिशन ऑन चाइल्ड सर्विटय़ूड (एसएसीसीएस) ऐसी पहली संस्था है जिसने 1997 में पहली बार भारतीय खेल सामाग्री निर्माण उद्योग में काम करने वाले बाल श्रमिकों की दुस्वार कठिनाइयों को पूरे जोर के साथ विश्व पटल पर रखा। एसएसीसीएस ने अपनी विस्तृत रिपोर्ट में बाल श्रमिकों का जो संख्या बतायी है वह उस समय ही लाखों में थी। एस ए सी सी एस की एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार 1998 में लगभग 10000 बच्चे जालंधर में कार्य करते थे। पहले, भारत में यह काम जालंधर और मेरठ में किया जाता था लेकिन आजकल गुडग़ांव में भी यह काम शुरू हो चुका है। भारत में खेल सामग्री उत्पादन में जालंधर पहले स्थान पर है जबकि उत्तर प्रदेश में मेरठ दूसरे स्थान पर। हरियाणा में गुडग़ांव तीसरे स्थान पर है।
बाल श्रमिकों का नारकीय जीवन
फुटबाल की सिलाई का कार्य बहुतायत रूप में घर पर ही किया जाता है। निर्माता कम्पनियां फुटबाल का पैनल अपनी फैक्ट्री में बनाती है और फिर उसे सब-कंाट्रैक्टर के माध्यम से लोगों के घरों पर काम करवाती हंै। इन मजदूरों में ज्यादातर बहुत गरीब परिवार के बच्चे होते हैं जो गरीबी रेखा के नीचे जीवन बसर करने को मजबूर होते हैं। यही बच्चे ठेकेदारों के शिकार बनते हैं। नीदर लैंड से प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार इस मजदूरों में से 90 प्रतिशत लोग भारतीय समाज में अछूत समझे जाने वाले दलित तबके से ताल्लुक रखते हैं। फुटबाल उद्योग में लगे दलित मजदूर और उनके बच्चे बाल मजदूरी और बंधुआ मजदूरी के सबसे बड़े शिकार हैं। 1998 में जब न्यूनतम दैनिक मजदूरी 63 रुपये थी तब एक बालिग मजदूर को 20 रुपये मिलते थे। आज भी वही हाल है। सामान्यत: एक बंधुआ मजदूर को न्यूनतम मजदूरी के बारे में पता ही नहीं होता है। भारतीय कानून के अनुसार मुख्य निर्मात कम्पनियों को मजदूरों के वेतन और अन्य सुविधाओं की जिम्मेदारी लेनी चाहिए। लेकिन हकीकत यह है कि इस बारे में न तो हमारे नीति निर्माताओं को चिन्ता है और न ही उन कम्पनियों को जिनके लिए ये बाल मजदूर अपना बचपना बर्बाद कर देते हैं। पांच साल से ही बच्चे इस काम में शामिल हो जाते हैं। इनमें से बहुत कम ऐसे बच्चे हैं जिन्होंने कभी स्कूल कभी स्कूल भी देखा हातो है। यदि स्कूल गये भी तो वे उसे जारी नहीं रख पाते क्योंकि उनके घर की माली हालात उन्हें यह करने नहीं देती। मेरठ के फुटबाल उद्योग में पूरा समय काम करने वाले बच्चों में से 40-50 प्रतिशत ऐसे बच्चे हैं जिनकी आयु 5 से 14 वर्ष के बीच है। पांच छ: वर्ष के बच्चे दस-दस घंटे काम करते हैं। उनके लिए यह न्यूनतम काम के घंटे होते हैं। सामान्यत: वह 11-12 घंटे लगातार काम करते हैं। ऐसी स्थिति में उन्हें बचपन में ही पीठ व जोड़ों के दर्द की शिकायत हो जाती है। 30 वर्ष के होते-होते उनकी आंख की रोशनी भी कम होने लगती है। और इस तरह वे किसी काम के नहीं रह जाते।
बालश्रम की रोकथाम का गोरखधंधा
फुटबाल निर्माण में बालश्रम रोकने के संबंध में अंतर्राष्ट्रीय फुटबाल महासंघ (फीफा) के वर्ष 1996 के प्रसिद्ध समझौते, यूरोपीय संसद के 2007 के प्रस्ताव, भारतीय खेल सामग्री निर्माण उद्योग के संबंध में साफ निर्देशों और सभी सरकारी दावों के बावजूद फुटबाल निर्माण में न सिर्फ बाल श्रम बल्कि बंधुआ मजदूरी का चलन भी जारी है। इंटरनेशनल लेबर राइट्स फोरम के सहयोग से बचपन बचाओ आंदोलन (बीबीए) द्वारा किए एक नए अध्ययन के अनुसार अभी भी 5,000 बच्चे फुटबाल सिलाई के साथ ही बेसबाल, क्रिकेट बाल, बास्केटबाल वॉलीबाल, टेनिस बाल और अन्य खेलों का सामान बनाने के काम में लगे हुए हैं। भारतीय खेल उद्योग कुल 318 तरह के खेल सामान बनाते हैं। उत्तर प्रदेश के मेरठ शहर और पंजाब के जालंधर की झुग्गियों में ये बच्चे अपने परिवार द्वारा भारी कर्ज के चलते बंधुआ मजदूरों की तरह काम करने के लिए मजबूर किए जाते हैं। इसका उनके स्वास्थ्य और शिक्षा पर काफी बुरा प्रभाव पड़ता है।प्रसिद्ध बाल अधिकार कार्यकर्ता और बीबीए के अध्यक्ष कैलाश सत्यार्थी द्वारा किए गए अध्ययन के ये निष्कर्ष ऑफ साइड चाइल्ड लेबर इन फुटबाल स्टीचिंग- ए केस स्टडी ऑफ मेरठ डिस्ट्रिक्ट शीर्षक से जारी किए गए हैं। सत्यार्थी ने इस अध्ययन में जिन पांच बच्चों को शामिल किया है वे अब बीबीए के अंतर्गत स्कूल में दाखिल हो चुके हैं। पर यह सवाल यह है कि जितने बड़े पैमाने पर इस उद्योग में बंधुआ मजदूरी का चलन है क्या उसके समाधान के लिए ये प्रयास नाकाफी नहीं हैं। कैलाश सत्यार्थी के अनुसार मेरठ के बाहरी इलाके बुद्धविहार और कमालपुर या नजदीकी गांव शिवाल खास में हजारों बच्चे कृत्रिम चमड़े से फुटबाल बनाने के काम में लगे हुए हैं। इन सामानों पर बाद में बालश्रम मुक्त का ठप्पा भी लगा दिया जाता है। बीबीए द्वारा वर्ष 1996 में पहली बार इस मामले को सामने लाने के बाद से फुटबाल सिलने में बच्चों के उपयोग में काफी अधिक कमी आई है। अंतर्राष्ट्रीय उपभोक्ताओं के दबाव और बीबीए और अन्य स्वंयसेवी संगठनों की गतिविधियों के कारण फुटबाल उद्योग में लगे बच्चों की संख्या 20,000 से घटकर अब 5,000 रह गई है।
बालश्रम से हो रही है देश की प्रगति!
भारत के फुटबाल उद्योग से न सिर्फ विदेशी कम्पनियां अकूत कमाई करती हैं वरन इससे भारत सरकार को भी करोड़ों फायदा होता है। 1998-1999 के बीच भारत ने 125.54 करोड़ रुपये की खेल सामग्री का व्यापार किया जबकि यही वर्ष 2000 में बढ़कर 7854. 76 लाख रूपए हो गया। भारत से बनी खोल सामग्री ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, स्पेन, नीदरलैंड अमेरिका आदि देशों को निर्यात होती है। यह कितना अजीब लगता है कि इतनी सम्पदा हमारे देश के नन्हें-नन्हें बच्चे पैदा करते हैं। बीबीए के अध्यन से यह स्पष्ट हो गया है कि इन बच्चों से 12-14 घंटे तक काम लिया जाता है। बच्चों के शरीरिक स्वास्थ्य पर इसका बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। इनमें से 35 प्रतिशत बच्चों को चमड़ा सिलने की सुई के कटने से घाव हो जाता है। कई बार यह घाव पक कर नासूर बन जाता है। इसी तरह अन्य 35 प्रतिशत बच्चों को आंख में दर्द, 50 प्रतिशत को पीठ दर्द और 85 फीसदी बच्चों को हाथों और अंगुलियों में बराबर दर्द की शिकायत रहती है। हालत यह है कि ये बच्चे जिन कम्पनियों के लिए काम करते हैं वे बच्चों के दवा इलाज तक की व्यवस्था नहीं करतीं। बीबीए से जुड़े मनोज मिश्रा का कहना है कि बंधुआ और बाल मजदूरी से मुक्त कराए गए अब तक हजारों बच्चों ने मजिस्ट्रेट और श्रम निरीक्षकों के सामने बार-बार बयान दिया है कि उनसे कहीं दो वक्त के रुखे-सूखे भोजन पर कहीं तो कहीं नाममात्र की मजदूरी पर हर रोज 14 से 16 घंटे काम कराया जाता है। इसके बावजूद श्रम विभाग वर्षों के बाद भी क्यों चुप्पी साधे बैठा है ? श्रम मंत्री तक ने इस मसले पर चुप्पी साध रखी है। उन्होंने यह भी कहा कि कारखानों का पंजीयन न होने से बाल श्रम कानून के तहत चालान होते ही कारखाना मालिक किराए के उस मकान को छोड़ कहीं अन्यत्र अड्डा जमा लेता है, जिससे अदालत में दायर सैकड़ों मुकद्में उसके लापता होने से अब तक खारिज हो चुके हैं। उन्होंने कहा कि बचपन बचाओ आन्दोलन का उद्देश्य समस्या को अंतर्राष्ट्रीय ग्राहकों के सामने सनसनी के रूप में पेश करना नहीं वरन उसके लिए प्रयास करना है। उन्होंने बताया कि बीबीए ने घरेलू उपभोक्ताओं के बीच भी यह अभियान शुरू किया है ताकि वे बालश्रम मुक्त खेल के सामान की मांग करें। जाहिर है यदि बीबीए अपने मकसद में कामयाब होता है तो निश्चित तौर पर यह भारत के लिए एक बहुत बड़ी उपलब्धि होगी।
सम्पर्क: एक कदम आगे-हिन्दी पाक्षिक, से.-5, वसुन्धरा, गाजियाबाद, उ.प्र. :: फोन नं. 09911806746

Wednesday, July 21, 2010

महाराष्ट्र में अब हाकरों का पंजीकरण होगा

हॉकरों का पंजीयन अनिवार्य करने के लिए विधेयक लाएगी महाराष्ट्र सरकार
मुम्बई, 21 जुलाई


श्रमिक वर्ग पर हर तरह की पाबंदियां धड़ल्ले लागू की जा रही हैं। रोजाना अपनी जान हथेली पर रखकर आजीविका कमाने वाले हाकरों के दमन का हथियार महाराष्ट्र सरकार तैयार कर रही है। जानकारी के अनुसार महाराष्ट्र सरकार आवासीय कॉलोनियों तथा अन्य इलाकों में सामान बेचने वाले हॉकरों के लिए पंजीयन अनिवार्य करने पर विचार कर रही है। इस पंजीयन को जरूरी बनाने के लिए राज्य विधानमंडल के जारी मानसून सत्र के दौरान विधान परिषद में इस सिलसिले में एक प्रस्ताव पेश किया जाएगा। इस विधेयक के मुताबिक हॉकरों के लिए स्थानीय निकायों में पंजीयन कराना जरूरी होगा। साथ ही सरकार को भी हॉकिंग और गैर हॉकिंग क्षेत्रों का निर्धारण करना होगा।
विधेयक में गलत इलाके में बिक्री करने या नीति में दिए गए किसी नियम को तोडऩे पर हॉकर को छह महीने कैद और पांच हजार रुपए जुर्माने की सजा दी जा सकती है।

एमसीडी की तोडफ़ोड़ में दो मजदूर दबे, एक की मौत

नई दिल्ली, 21 जुलाई
दिल्ली नगर निगम की ओर से मोरीगेट स्थित राम बाजार इलाके में एर जर्जर इमारत ढहवाने के दौरान मलबे में दो मजदूर दब गए। इनमें से एक मजदूर की मौत हो गई। दूसरे की हालत गंभीर बनी हुई है। हादसा उस समय हुआ जब एमसीडी के अधिकारी मजदूरों को दिहाड़ी पर लेकर दो मंजिला जर्जर इमारत को ढहाने पहुंचे थे। अभी इस मामले में कश्मीरी गेट थाना पुलिस ने कोई मामला दर्ज नहीं किया है। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि मकान मालिक पहले ही इमारत को खाली कर चुका है। एमसीडी के अधिकारी अपनी निगरानी में मकान को ढहा रहे थे। जिससे अधिकारी ही इसके लिए जिम्मेदार हो सकते हैं। उत्तरी जिला पुलिस उपायुक्त डॉ. सागर प्रीत हुड्डा के मुताबिक मामले की जांच की जा रही है।
मरने वाले मजदूर की पहचान मुरादाबाद निवासी रामबीर (30) के रूप में हुई है। मोरीगेट, रामबाजार स्थित उक्त मकान को बीते 16 जुलाई को एमसीडी ने जर्जर घोषित कर दिया था। यह इमारत किसका है इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है। बुधवार को एमसीडी के सिटी जोन से एई अनिल कुमार व जेई मो. शकील जामा मस्जिद इलाके से चार मजदूरों को लेकर इमारत ढहाने पहुंच गए थे।
दोपहर करीब सवा तीन बजे यह हादसा हुआ। करीब 10 फीट ऊंची एक दीवार दोनों मजदूरों के ऊपर आ गिरी। दोनों मजदूर मलबे के नीचे दब गए। उन्हें किसी तरह लोगों की मदद से मलबे से बाहर निकाला गया। रामबीर अन्य मजदूरोंके साथ मीना बाजार जामा मस्जिद इलाके में रहता था। पोस्टमार्टम के लिए शव को सब्जीमंडी मोर्चरी में रखवा दिया गया है। उधर घटना को देखते हुए निगमायुक्त केएस मेहरा ने शहरी क्षेत्र के उपायुक्त कृष्ण कुमार को पूरे मामले की जांच के आदेश दिए हैं। रिपोर्ट तीन दिनों के अंदर देने को कहा गया है।

Sunday, July 18, 2010

चंद ईंटों से सस्ती है भारत में मजदूरों की जान


कुएं में दबे मजदूर को निकालने की कवायद जारी
आगरा 17 जुलाई, एजेंसी


मजदूरों की जिंदगी भारत में कितनी सस्ती है उसकी बानगी है यह खबर। यहां ईंटों को निकालने के लिए मजदूरों को लगा दिया। वह भी उस कुएं में जो बेहद जर्जर हो गया था और उसके धंसने का भय पैदा हो गया था। ईंटों के कुएं में दफन होने के डर से ठाकुर ने मजदूरों को उन्हें बाहर निकालने के लिए लगा दिया।
आगरा के बरहन गांव में ईंट हटाते समय एक कुंए में दबे दो मजदूरों को निकालने के लिए खुदाई जारी है।
सूत्रों के अनुसार शुक्रवार से शनिवार दोपहर तक लगभग 50-55 फीट खुदाई हो चुकी थी लेकिन दोपहर बाद मिट्टी की एक ढेर पुन: गडे में पलट गई है। मजदूरों के जीवित होने के संबंध पर तो कुछ नही कहा जा सकता परन्तु एक बार फिर खुदाई प्रारम्भ कर मजदूरों को निकालने के प्रयास किए जा रहे है।
गौरतलब है कि शुक्रवार को बरहन गांव में भूरी सिंह नामक व्यक्ति के पुराने कुएं में पडी ईटों को पांच श्रमिक बाहर निकाल रहे थे। तभी उसमें नीचे काम कर रहे दो मजदूरों के उपर मिट्टी की ढाक गिर गई और दोनों मजदूर उसमें दब गए। हालांकि पुलिस ने अभी ठाकुर पर कोई मुकदमा दायर नहीं किया है।

विस्फोट में घायल युवा श्रमिक की मौत

रायगढ़ 11 जुलाई

देश में बहुत कम वेतन पर खतरनाक भट्ठियों में काम करने वाले लाखों मजदूरों की जान सुरक्षित नहीं है। आए दिन औद्योगिक दुर्घटनाओं में मजदूर अपनी जान से हाथ धो रहे हैं फिर भी मुनाफे की हवश में मालिकान सुरक्षा मानकों को नजरअंदाज करने की कोशिश कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले में तरईमाल स्थित बी एस स्पंज आयरन फैक्टरी में हुए औद्योगिक हादसे में घायल हुए एक श्रमिक की उपचार के दौरान मौत हो गई है।
पुलिस अधिकारियों ने आज बताया कि बी एस स्पंज आयर प्रा. लि.मि. में एक सप्ताह पूर्व किलन के पाईप में देर रात हुए विस्फोट में झुलसे एक श्रमिक की प्राइवेट नर्सिंग होम में इलाज के दौरान कल रात मौत हो गई।
पुलिस ने मृतक की पहचान चंद्रपुर क्षेत्र के लोकेश्वर मालाकार (20) के तौर पर की है। मृतक के परिजनों ने प्रबंधन पर मजदूरों की सुरक्षा से समझौता करने का आरोप लगाया है। उधर क्षेत्रीय कांग्रेस विधायक हृदयराम राठिया ने मृतक के परिजनों को 10 लाख रू. मुआवजा देने की मांग प्रबंधन से की है अन्यथा आंदोलन करने की चेतावनी दी है।

तेजी से बढ़ रही है शहरी आबादी, वर्ष 2021 तक हो जाएगी 53 करोड़

नई दिल्ली, एजेंसी

देश की शहरी आबादी में बेतहाशा वृद्धि होती जा हो रही है और इसका कारण ग्रामीण आबादी पर बढ़ रहा दबाव है। सेज और बड़े पैमाने पर भूमि अधिग्रहणों के कारण बड़ी तादाद में ग्रामीण आबादी मजदूरी करने के लिए शहरों की ओर कूच कर रही है। आधिकारिक आंकड़े शहरों में जनसंख्या विस्फोट होने के संकेत देते हैं, जिसके तहत आबादी वर्तमान में 32 करोड़ से बढ़कर वर्ष 2021 तक 53 करोड़ हो जाएगी।
शहरी विकास मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि मौजूदा जनगणना के तहत शहरी आबादी का आंकड़ा 32 करोड़ के पार हो जाने की आशंका है। मौजूदा आंकड़ों का संकलन अगले वर्ष तक होगा। वर्ष 2001 में हुई जनगणना में शहरी आबादी 28.61 करोड़ थी। यह आंकड़ा वर्ष 2021 तक बढ़कर 53 करोड़ हो सकता है।
अधिकारी का कहना है, ''शहरीकरण का रूझान उत्साहजनक है। भारत अगले दशक में वैश्विक औसत तक पहुंच जाएगा। यह रफ्तार अब काफी बढ़ गई है।Ó असल में यह उत्साहजनक माहौल पूंजीपतियों के मनमाफिक है। क्योंकि आधारभूत संरचनाओं से लैस शहरी और औद्योगिक इलाकों में मजदूरों की लंबी लाइन से उन्हें सस्ता श्रम हासिल करने में आसानी होगी। सस्ते श्रम के लिए बड़े पैमाने पर बेरोजगारी शासक वर्ग के लिए मजबूरी है।
मंत्रालय के अधिकारियों के मुताबिक, शहरी आबादी बढऩे से जलापूर्ति, गंदे पानी की निकासी और लोक परिवहन जैसी आधारभूत संरचना पर काफी दबाव पड़ेगा। इससे सभी प्रमुख शहरों में मकानों की उपलब्धता पर भी असर पडेगा। लेकिन शासक वर्ग को केवल मुनाफे की मलाई खाने में ही दिलचस्पी है। मजदूरों की जीवन परिस्थियों में सुधार उसका न कभी उद्देश्य था और न ही है। इसीलिए सरकार एक तरफ तो शहरी इनफ्रास्ट्क्चर पर दबाव बढ़ने का रोना रो रही है और दूसरी तरफ भारी पैमाने पर सस्ते श्रमिक मिलने से उसकी बाछें खिल गई हैं।

Saturday, July 17, 2010

हम हारे, क्योंकि हम कमजोर थे

देवेन्द्र प्रताप

आज किसी भी क्षेत्र का मजदूर हो आमतौर पर उसे 12 घंटे से ज्यादा काम करना पड़ता है। देश में न्यूनतम मजदूरी ऐक्ट के बने होने के बावजूद देश में मजदूरों की एक बड़ी आबादी ऐसी है जो न्यूनतम मजदूरी से वंचित है। यदि किसी को न्यूनतम मजदूरी के बराबर या उससे ज्यादा मजदूरी मिलती है तो उसे आठ घंटे की जगह 12 घंटे-14 घंटे काम करना पड़ता है। नियम तो यह भी है कि एक मजदूर जो 8 घंटे से ज्यादा काम करता है तो उसे अतिरिक्त काम के घंटो के लिए दोगुनी दर से मजदूरी का भुगतान किया जाए। ऐसे ही अन्य नियम भी हैं जिन्हें यदि सरकार लागू कर दे तो मजदूरों की दाना-पानी से सम्बन्धित अधिकांश समस्याएं समाप्त हो जाएंगी। लेकिन पिछले 50-60 साल में फिलहाल ऐसा नहीं नजर आया जबकि किसी सरकार ने मजदूरों की ओर से बिना दबाव पड़े उनकी समस्याओं का समाधान कर दिया हो। आज तो यह हालत है कि मजदूरों ने काफी संघर्ष और कुर्बानियों के बाद जो अधिकार हासिल किया था आज सरकार उनको भी छीनने में लगी हुई है। आज मजदूर आन्दोलन भी पस्ती की हालत में है इसलिए वह सरकार के ऊपर दबाव बनाने में सक्षम नहीं है। उसके आन्दोलन की मददगार वामपंथी पार्टियों ने भी आज अपने पांव पीछे कर लिए हैं या फिर सिर्फ कदमताल करने में लगी हुई हैं। आज उनकी समूची ताकत टूटकर कई-कई खण्डों में विभाजित हो गयी हैं। वामवंथी आन्दोलन का विखराव भी मजदूरों की समस्याओं के लिए एक प्रधान कारण है। जिस समय देश में मजदूर आन्दोलन चढ़ाव पर था तो मजदूरों के अलग-अलग सेक्शन एक दूसरे के आन्दोलनों को मदद करते थे लेकिन आज स्थिति बिल्कु ल बदल गयी है। आज एक दूसरे की मदद करने की भावना न सिर्फ समाज से बल्कि मजदूर आन्दोलन से भी गायब हो गयी हो गयी है। इसी त्रासदी का परिणाम है कि 21वीं सदी में प्रवेश कर चुकी मानव सभ्यता में आज भी कड़ी मेहनत करने वाला मजदूर दो वक्त की रोटी नहीं जुटा पा रहा है। सीपीआई, सीपीएम जैसी वामपंथी पार्टियों की हालत यह है कि उन्होंने अपने विभाजन के साथ ही देश के मजदूरों को भी अलग-अलग बांट दिया है। हकीकत तो यह है कि मजदूरों के अलग-अलग संगठन आज वाम और दक्षिण दोनों तरह की पार्टियों के पॉकेट संगठन बन गये हैं। जहां तक भवन निर्माण जैसे असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की हालत तो और भी खराब है। ज्यादातर संगठित क्षेत्र में मजदूरों की यूनियनें हैं भले ही उनकी हालत कितनी ही कमजोर क्यों न हो। जहां तक भवन निर्माण के क्षेत्र में मजदूर यूनियन का सवाल है यह समूचा क्षेत्र अभी इससे वंचित है। कुछेक यूनियनें हैं भी तो उनकी हालत बेहद खराब है। पिछले एक दशक से निर्माण क्षेत्र में देश में वामपंथी और कुछ दक्षिण पंथी पार्टियों के संगठन काम कर रहे हैं लेकिन अभी तक उनके ऊपर मजदूर वर्ग का विश्वास नहीं जम पाया है। इनकी सबसे खराब बात यह है कि ये मजदूरों को सेक्शनल लड़ाइयों तक ही सीमित रखते हैं। ऐसा लगता है कि आज इनके लिए -दुनिया के मजदूरों एक हो का नारा- मात्र कागज पर लिखे कुछ लाल-लाल अक्षर से ज्यादा अहमियत नहीं रखता। राष्ट्र निर्माण में अपना श्रम बेच कर 85 प्रतिशत से अधिक का योगदान डालने वाला मजदूर खुद अपने विकास से कोसों दूर है। सवाल उससे भी बनता है कि आखिर कब तक किसी मसीहा की प्रतीक्षा करेगा? यह भी एक कमजोरी है कि मजदूर आमतौर पर सोचता है कि लोग उसकी मदद करने आयेंगे। जब तक पानी सर के ऊपर से नहीं गुजर जाता तब तक उसे विरोध की राजनीति करने की नहीं सूझती। और जब समस्याएं इतनी ज्यादा हो जाती हैं कि लड़े बिना काम नहीं चलता तो वह लड़ता है। लेकिन ऐसा देखने में आता है कि किसी एक क्षेत्र का मजदूर अपने दूसरे मजदूर भाइयों की मांगों को नहीं उठाता। इस मामले में वह स्वार्थी होता है। और ज्योंही उसका स्वार्थ पूरा हो जाता है यानी उसका मालिक उसकी कुछ मांगों को मांग लेता है तो वह दूसरे भाइयों का दर्द भूल जाता है। वह कभी-कभी अपने दूसरे मजदूर भाइयों के बारे में सोचता भी है तो उनके साथ कोई एकता नहीं बनाता। किसी पेशे विशेष के मजदूर की यही प्रवृत्ति, उनका यही स्वार्थ उसे दूसरे मजदूरों से काट देता है। अगर वह हार जाता है तो वह निराशा के भंवर में फंस जाता है। उसे लगता है कि सारी दुनिया में उसकी ओर से कोई लडऩे वाला नहीं है। वह सोचता है कि मालिकों की ताकत ज्यादा है वे उससे ज्यादा ताकतवर हैं और वह उनसे नहीं जीत सकता। वह जो सोचता है सही सोचता है वह इस मामले में कोई मध्यवॢगयों जैसी रुमानियत का शिकार नहीं है। बल्कि सच कहें तो वह ज्यादा यथार्थवादी है। आज के मजदूर आन्दोलन के पराभव के पीछे यह एक बहुत बड़ी सच्चाई है। लेकिन कहते हैं न कि हर हार में जीत के भी कुछ बीज छुपे होतें होते हैं। इस मामले में भी यह लागू होता है। मजदूर हारता है क्योंकि वह अलग-अलग पेशागत लड़ाइयां लड़ता है। कई बार एक पेशे विशेष का मजदूर भी कई-कई खण्डों में बंटा होता है। यही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी है। उसके सामने जो दुश्मन है वह ज्यादा ताकतवर सिर्फ इसलिए है क्योंंकि वह संगठित है। न सिर्फ देश के पैमाने पर वरन अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भी वह संगठित है। इसलिए जब लड़ाई एक कमजोर और ताकतवर के बीच होगी तो निश्चित ही जीत ताकतवर की होगी। इस गुत्थी को हल किये बिना मजदूर वर्ग के लिए जीत की कल्पना करना भी मुश्किल है। आज उसके लिए सबसे ज्यादा जरुरत इस बात की है कि वह अपनी गलती ठीक करे।

जी-20 सम्मेलन : फिर वही गिले शिकवे फिर वही वादे


                                                              देवेन्द्र प्रताप
वर्ष 2008 में आयी अमेरिकी आर्थिक मंदी ने न सिर्फ अमेरिका को बल्कि एक मायने में समस्त विश्व को अपने चपेट में लिया था। इसकी गम्भीरता का अन्दाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अप्रैल 2009 में हुए जी-20 सम्मेलन में आर्थिक मंदी ही केन्द्रीय मुद्दा था। आज जबकि एक साल बाद पुन: जी-20 देशों का कनाडा में सम्मेलन होने जा रहा है ऐसे में आर्थिक मंदी और उससे निपटने के लिए पिछले सम्मेलन में किए गये वादों और उसके प्रयासों को याद करना निहायत जरूरी है।
इतिहास के आइने से
दो साल पहले अमेरिका में आयी मंदी का असर इतना तगड़ा था कि सिर्फ 2008 में ही मात्र एक साल के अन्दर वहां के पूंजीपतियों ने अपने मुनाफे को बचाने के लिए 26 लाख को नौकरी से निकाल दिया था। 1930 की आर्थिक मंदी के बाद जब पूंजीपतियों के बीच बाजार के बंटवारे के हुए द्वितीय विश्व युद्ध हुआ था तो उस समय भी जबरदस्त तौर पर बेरोजगारी बढ़ी थी। लेकिन वर्तमान आर्थिक मंदी ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हंै। अमेरिका में दिसंबर 2008 में यानी सिर्फ एक माह में पाँच लाख 24 हज़ार लोगों को नौकरी से हाथ धोना पड़ा था। दिसंबर में जो नौकरियाँ घटीं उनमें से अधिकतर सर्विस सैक्टर की थीं जहाँ दो लाख 73 हज़ार लोगों को नौकरी से हाथ धोना पड़ा था। नवंबर में अमरीका में पाँच लाख 84 हज़ार नौकरियाँ गईं जबकि अक्तूबर में चार लाख 23 हज़ार नौकरियाँ गई थीं।वर्ष 2008 में अमेरिका में पैदा हुई बेरोजगारी पिछले 16 सालों में सबसे ज्यादा थी। दिसंबर 2008 में बेरोजगारी की दर 7.2 प्रतिशत पर पहंच गयी थी। जबकि यही फरवरी 2009 में बेरोगारी दर 8 प्रतिशत से ऊपर पहुंच गयी थी।विमान कंपनी बोइंग ने भी इस साल 4500 जबकि टाटा स्टील की सहायक कंपनी कोरस ने 3500 लोगों को नौकरी से बाहर किया। कोरस के इन कर्मचारियों में से सिफऱ् ब्रिटेन में ही 2500 लोगों को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा था। गौरतलब है कि कोरस के दुनियां भर में 42 हज़ार कर्मचारी हैं, जिनमें से 24 हज़ार सिर्फ ब्रिटेन में हैं। अमरीका की कार कंपनी जनरल मोटर्स ने भी पूरी दुनिया में अपने कारखानों में काम करने वाले करीब 47 हज़ार मजदूरों और कर्मचारियों को बाहर निकाल दिया था। उसे दुनिया भर के अपने 14 कारखानों को बंद करना पड़ा था। यही काम अमेरिका की क्राइसलर कंपनी ने भी किया था। इस मंदी के कारण उसे तीन हजार मजदूरों को नौकरी से बाहर करना पड़ा। अमेरिका की नामी गिरामी कार कम्पनी फोर्ड को 14.6 अरब डॉलर का नुकसान हुआ जो उसके लिए किसी सदमें से कम नहीं था। विश्व की सबसे बड़ी कार निर्माता कंपनी टोयोटा को वर्ष 2008 में कारों की माँग में भारी कमी आ जाने की वजह से 150 अरब जापानी येन यानी एक अरब 65 करोड़ डॉलर का नुकसान हुआ था। जाहिर है पूंजीपतियों ने अपना यह तथाकथित घाटा भी मजदूरों के पेट पर लात मार कर पूरा करने का काम किया।
दुनिया भर में इस मंदी का सबसे ज्यादा असर आईटी पेशेवरों पर पड़ा था। भारत भी इससे अछूता नहीं था। वर्ष 2008 के आखिरी तीन महीनों यानी अक्तूबर से दिसंबर के बीच भारत में एक मात्र आई टी क्षेत्र में ही पाँच लाख लोगों का रोजग़ार छिन गया था। यह आँकड़ा भारत के केंद्रीय श्रम मंत्रालय का है और वो भी सिफऱ् संगठित क्षेत्रों से मिली सूचनाओं के आधार पर। इनमें गुजरात के हीरा कारोबारियों के यहाँ काम करने वाले दिहाड़ी मज़दूर शामिल नहीं हैं और ना सिर्फ एक साल पहले तक गुलजार नजऱ आने वाले कर्नाटक में बेल्लारी के लौह खनन उद्योगों में रोजग़ार गँवाने वालों की गिनती है। यही वह पृष्ठभूमि थी जब पिछले वर्ष लंदन में दुनिया भर से बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी लंदन में इकठ्ठा हुए थे। इस सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिएअमरीकी राष्ट्रपति ओबामा समेत कई बड़े नेता लंदन पहुंच चुके थे। चेहरे पर मुखौटे लगाए और चोग़े पहने हुए पूंजीवाद विरोधी नारे लगाने वाले हज़ारों प्रदर्शनकारियों के साथ पुलिस की छिटपुट झड़पें भी हुईं थीं। मैट्रोपोलिटन पुलिस के अनुसार पिछली बार सुरक्षा इंतज़ामों के लिए ढाई हज़ार अतिरिक्त पुलिसकर्मी लगाये गये थे औऱ इस सुरक्षा अभियान पर कऱीब एक करोड़ डॉलर खर्च किया गया था। इन सबके बावजूद सम्मेलन हुआ और सम्मेलन में मौजूद देशों ने और खासकर अमेरिका और ब्रिटेन ने दुनिया को यह भरोसा दिलाया कि जल्दी ही इस आर्थिक मंदी से निपट लिया जायेगा। लेकिन हकीकत कुछ और ही है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के एक अनुमान के अनुसार वैश्विक आर्थिक मंदी की वजह से एक साल के अन्दर समूची दुनिया में पाँच करोड़ से अधिक लोगों को नौकरी गँवानी पड़ी। आईएलओ के महानिदेशक हुआन सोमाविया का कहना है कि इसकी वजह से दुनिया भर में बेरोजग़ारी का आंकड़ा करीब सात प्रतिशत तक पहुँच गया। श्रम संगठन का कहना है, कि फि़लिप्स, होमडिपो, आईएनजी और कैटरपिलर जैसी कंपनियों में हुई छँटनियों के कारण बेरोजगारी में भयंकर इजाफा हुआ है। पिछले वर्ष सबसे अधिक नई नौकरियों के अवसर एशिया में पैदा हुए, दुनिया भर की कुल नई नौकरियों का 57 प्रतिशत हिस्सा एशियाई देशों से आया। आईएलओ का कहना है कि दुनिया भर में छाई आर्थिक मंदी की वजह से एशियाई देशों के नौकरी बाज़ार में बढ़ोतरी की जगह छँटनी का दौर शुरु हो गया जिसने दुनिया के सामने एक भयंकर संकट पैदा कर दिया है। भारत और चीन जैसे देश दुनिया भर से मिलने वाले ऑर्डरों की कमी की वजह से बुरी हालत में जा पहुंच सकते हैं। यानी कुल मिलाकर देखा जाए तो पूंजीवादी व्यवस्था की खुद अपनी ही संस्थाएं पिछले वर्ष हुए सम्मेलन में किए गए वायदों की कलई खोल देती हैं।
जनता का विरोध, हुक्मरानों की चुप्पी
पिछले वर्ष की तरह इस बार भी टोरंटो शहर में जी-20 सम्मेलन स्थल के बाहर शनिवार को करीब 10,000 लोगों के विरोध-प्रदर्शन के दौरान छिटपुट हिंसा भी हुई। सिन्हुआ समाचार एजेंसी के अनुसार पुलिस ने 100 से ज्यादा प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार किया और उन्हे तितर-बितर करने के लिए आंसू गैस के गोले दागे। जवाब में प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर पत्थर, बोतलें और ईटे बरसाईं और सुरक्षा घेरा तोड़ते हुए कांफ्रेंस सेंटर में दाखिल होने का प्रयास किया। इस पर काबू पाने के लिए 12,000 पुलिस अधिकारियों को तैनात किया गया था। इन प्रदर्शनकारियों के अनुसार सम्मेलन में बैठने वाले पूंजीवादी लोग ही बेरोजगारी, पर्यावरण की तबाही और अन्य मानवीय और पर्यावरणीय विभीषिकाओं के लिए जिम्मेदार हैं। उनकी बात को एक सिरे से खारिज करना इसलिए भी मुश्किल है कि इस बार कनाडा में हुए जी-20 देशों के सम्मेलन में भी नेताओं ने वही सब नाटक दोहराया जैसा कि पिछले सम्मेलन में हुआ था। पूरे सम्मेलन में विभिन्न देश इस बात को लेकर बँटे रहे कि उन्हें बजट घाटे को कम करने पर जोर देना चाहिए या आर्थिक विकास में तेज़ी लाने के लिए काम करना चाहिए।
पूंजीपती ही लेते हैं निर्णय
इस बैठक में विभिन्न देशों के प्रतिनिधि तो भाग लेते ही हैं साथ ही उन देशों के पूंजीपति भी भाग लेते हैं। यूरोपीय देशों का औद्योगिक समुदाय एक पक्ष में है जबकि शेष सदस्य देशों का उद्योग जगत दूसरे पक्ष में है। भारत का प्रमुख उद्योग चैंबर फिक्की ने गैर-यूरोपीय देशों के उद्योग चैंबरों के साथ मिल कर यूरोपीय देशों की तरफ से उठाए जाने वाले संरक्षणवादी कदमों का विरोध किया। ऐसा माना जाता है कि जी-20 की बैठक में इन औद्योगिक समूहों के विचारों का काफी महत्व होता हैै। इन औद्योगिक समूहों का जी-20 की बैठक में कितना महत्व है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि टोरंटो में समूह देशों की बैठक स्थल के पास ही ये अलग से भी अपनी बैठक करते रहे। हर सदस्य देश के उद्योग चैंबर अपने देश की सरकार को मुद्दों के बारे में लगातार राय देते रहे। यह बात दिन के उजाले की तरह साफ है कि इन औद्योगिक समूहों के फैसले शीर्ष नेताओं की वार्ताओं पर भी असर डालते हैं।
तानाशाह कभी नहीं सीखता

किसी विद्वान ने हिटलर के लिए कहा था कि तानाशाह कभी नहीं सीखता। लेकिन ऐसा लगता है कि आज दुनिया के अधिकांश पूंंजीवादी देशों के हुक्मरान हिटलर के ही रास्ते को अनुसरण करने में लगे हुए हैं। ऐसे तानाशाहों की दूसरी खूबी यह होती है कि वे कभी अपनी गलती नहीं मानते। वे हमेशा ही अपनी गलतियां का ठीेकरा दूसरों के सिर पर फोड़ते हैं। उलटा चोर कोतवाल को डांटे वाली कहावत सबसे अच्छी तरह उनके उपर लागू होती है। लेकिन कभी-कभी इतिहास में ऐसे मौके आ जाते हैं जब हुक्मरानों के सारे झूठ बेपर्दा हो जाते हैं। दो वर्ष पहले जब अमेरिका में आर्थिक मंदी आयी थी तो कुछ ऐसा ही हुआ था। पहले तो उसे वहां के हुक्मरानों ने यथाशक्ति छुपाये रखने की कोशिश की लेकिन आखिरकार सच्चाई बाहर आ ही गयी। सच्चाई बाहर आने के बाद दुनिया ने देखा कि दुनिया का दादा बनने वाले अमेरिका के पास खुद अपना तन ढांकने के लिए कपड़ा नहीं है। अब चाहे वह इरान के ऊपर गुर्राए या फिर पिछले सम्मेलन की तरह ही दुनिया को नए-नए सब्जबाग दिखाए लेकिन हकीकत तो यही है कि अब उसके ऊपर भरोसा करना बेवकूफी ही होगी। शायद यही वजह थी कि इस बार हजारों की संख्या में प्रदर्शनकारियों ने कनाडा में भी प्रदर्शन किया है उनकी मांगें कमोवेश वहीं हैं जो पिछले साल थीं। ऐसा लगता है कि यह एक अनवरत सिलसिला है जो चलता रहेगा। मुश्किल ही है कि दुनिया के हुक्मरान उनकी बातों पर गौर करें, कम से कम इतिहास तो यही बताता है।
संपर्क : email-devhills@gmai.com, मोबाइल नं. 9911806746

Friday, July 16, 2010

यूनियन को बदनाम करने के लिए ऐसे हुआ सर्वे

प्रबंधन को यूनियन नेताओं से ज्यादा भला बताया


संदीप राऊजी
जमशेदपुर में प्रबंधन एक कदम आगे जाकर अब प्रायोजित सर्वे करा रहा है। हाल ही में एक प्रायोजित सर्वे कराया गया जिसमें दिखाया गया है कि मजदूर अब यूनियन नेताओं पर भरोसा करने की बजाय मैनेजर साहब के पास अपनी समस्याएं लेकर जाने लगे हैं। यह हास्यास्पद सर्वे खासकर अखबारों के लिए तैयार किया गया और उसे खूब प्रचारित प्रसारित किया गया। यूनियनों को बदनाम करने के लिए जरा इस सर्वे का सर्वे करें-
लौहनगरी में टाटा स्टील व टाटा मोटर्स जैसी कंपनियों के अलावा छोटी-बड़ी करीब डेढ़ हजार कंपनियां हैं। इनकी बदौलत इस शहर की ख्याति पूरी दुनिया में तो है ही, इसे झारखंड की औद्योगिक राजधानी भी कहा जाता है। यही नहीं, यहां टाटा वर्कर्स यूनियन जैसा श्रमिक संगठन भी है, जिसके अध्यक्ष कभी नेताजी सुभाषचंद्र बोस भी रहे। इसके अलावा भी यहां सैकड़ों यूनियनें किसी न किसी रूप में सक्रिय हैं।
हाल ही में कौटिल्य विधि महाविद्यालय द्वारा टाटा स्टील, टाटा मोटर्स समेत आदित्यपुर औद्योगिक क्षेत्र की कंपनियों के करीब 1200 मजदूरों-कर्मचारियों के बीच सर्वे कराया गया। हालांकि यह बात ओपेन सीक्रेट है कि यह घृणित काम प्रबंधन की शह पर किया गया। सर्वे में नतीजा निकाला गया कि यहां के मजदूर, ट्रेड यूनियन नेता की बजाय अपनी समस्या का निदान कराने को प्रबंधक के पास जाना ज्यादा मुनासिब समझते हैं।
सर्वे में सबसे बड़ा जो झूठ है वह यह कि 80 फीसदी मजदूर अपनी समस्या के लिए प्रबंधक के पास जाते हैं क्योंकि अब वे ज्यादा व्यवहारिक हैं। व्यवहारिक शब्द पर ध्यान दीजिएगा। सर्वे में कहा गया कि मजदूरों का मानना है कि उनके प्रबंधक सरकारी विभागों से ज्यादा डरते हैं, कानून या ट्रेड यूनियन से कम। 90 फीसदी मजदूर ट्रेड यूनियन को विश्वसनीय नहीं मानते, तो 95 फीसदी मजदूरों का मानना है कि नेता से उनके प्रबंधक ज्यादा ईमानदार हैं। इसके बावजूद करीब 70 फीसदी मजदूर प्रबंधक से काम कराने के लिए अपने साथी की सहायता लेते हैं, जबकि 20 फीसदी अकेले जाते हैं। पांच फीसदी मजदूर ही ट्रेड यूनियन लीडर से सहायता लेते हैं। जहां तक जानकारी की बात है, तो मजदूरों में पर्यावरण-प्रदूषण के बारे में जागृति बढ़ी है, तो सूचना का अधिकारी, श्रम कानून व मानवाधिकार के बारे में भी जानते हैं। यह दीगर बात है कि मजदूरों के अधिकारों, श्रमकानूनों के पालन जैसी विषयवस्तु पर कोई सर्वे नहीं कराया गया।
सर्वे में कहा गया है कि सरकारी विभाग के मामले में मजदूरों की राय स्पष्ट है। भ्रष्ट विभागों में उन्होंने फैक्ट्री इंस्पेक्टर, पीएफ विभाग, लेबर कमिश्नर को पहला, दूसरा व तीसरा स्थान दिया। उनसे जब पूछा गया कि अगर कोई आपके अधिकारों का हनन करता है, तो आप किसकी सहायता लेना पसंद करेंगे, इसमें भी 80 फीसदी ने प्रबंधक, 15 फीसदी ने सरकारी विभाग व 10 फीसदी ने कानून या कोर्ट की सहायता लेने की बात कही। पांच फीसदी ने ट्रेड यूनियन की मदद लेने की बात कही। निष्कर्ष में सर्वे पाठक को चौंकाने वाले अंदाज में बताता है कि 95 फीसदी मजदूरों ने अपनी कंपनी में किसी सरकारी अधिकारी को जांच या कार्रवाई के लिए आते नहीं देखा। कंपनियों में 10 फीसदी ही सिर्फ मैट्रिक तक पढ़े-लिखे मिले, शेष के पास इससे ज्यादा या कोई तकनीकी प्रशिक्षण था। और अंत में दुनिया का सातवां आश्चर्य यह है कि सर्वे घोषित करता कि साठ फीसदी मजदूरों को कार्यस्थल का माहौल अच्छा लगता है।
सर्वे में पूछे गए सवाल और जवाब
1. आपके प्रबंधक ईमानदार हैं : 95 -हां- 5 नहीं
2. ट्रेड यूनियन नेता विश्वसनीय हैं : 90 फीसदी-नहीं
3. श्रम कानून की कितनी जानकारी : 50-50 फीसदी
4. सबसे भ्रष्ट विभाग : फैक्ट्री इंस्पेक्टर -60, पीएफ विभाग-20, श्रम विभाग : 20
5. अधिकारों के प्रति जागरुक : 95


झूठ के ऐसे पुलिंदे टनों रोजाना पूंजीवादी अखबारों में बाक्स और हेडलाइन बनते हैं। इनसे सजग रहने का यही तरीका है कि हम इनके हथकंडों को उजागर करें। कहीं न कहीं ट्रेड यूनियनों की भी रणनीतिक गलती है। वे भी सर्वे करा सकती हैं भले ही वह न छपे लेकिन मजदूर अखबारों, वैकल्पिक मीडिया जगत में तो इन्हें स्थान मिल ही जाएगा। दूसरी बात कि अभी तक इस सर्वे के खिलाफ किसी ट्रेडयूनियन का विरोध सामने नहीं आया है जो इस झूठ को और स्थापित करने में ही मदद देगा।

महंगाई के खिलाफ ट्रेडयूनियनों की देशव्यापी हड़ताल

प्रमुख ट्रेड यूनियनें 7 सितंबर को देशव्यापी हड़ताल करेंगी
केंद्र सरकार के कर्मचारी संघ भी सात सिंतबर की हड़ताल के समर्थन में
नई दिल्ली 16 जुलाई

कांग्रेस समर्थित इंटक और वामपंथी समेत नौ प्रमुख ट्रेड यूनियनों ने महंगाई और केन्द्र सरकार की आर्थिक नीतियों के खिलाफ 7 सितंबर को हड़ताल पर जाने का आह्वान किया है। इंटक, एआईटीयूसी, हिंद मजदूर सभा, सीटू, एआईयूटीयूसी, टीयूसीसी, एआईसीसीटीयू, यूटीयूसी और एलपीएफ के संयुक्त सम्मेलन में इसकी घोषणा की गई। इन संगठनों के नेताओं और सदस्यों ने हिस्सा लिया।
7 सितंबर की राष्ट्रव्यापी हड़ताल के समर्थन में केंद्र सरकार कर्मचारी संघ भी उतर आया। केंद्र सरकार कर्मचारी संघ ने केंद्र सरकार कर्मचारियों की पहली अनिश्चितकालीन हड़ताल की 50 वीं बरसी पर आज यहां बैठक की। केंद्र सरकार कर्मचारियों ने 12जुलाई, 1960 को पहली अनिश्चित कालीन हड़ताल की थी।
आल इंडिया रेलवे मेंस फेडरेशन के महासचिव शिव गोपाल मिश्रा ने यहां बताया, 'हम हड़ताल को संभव बनाने वाले अपने कामरेडों के साहसिक प्रयासों को नहीं भुला सकते। Ó उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार के कर्मचारियों ने पहली हड़ताल तब की थी जब केंद्र सरकार ने पहले वेतन आयोग की सिफारिश के आधार पर मंहगाई भत्ता के भुगतान करने और जनमत के जरिए यूनियन को मान्यता देने से इनकार कर दिया था।
भाजपा समर्थित भारतीय मजदूर संघ :बीएमएस: ने सम्मेलन का बहिष्कार किया। एआईटीयूसी के महासचिव गुरुदास दासगुप्ता ने कहा, '' भारत के इतिहास में पहली बार इंटक सहित सभी केन्द्रीय ट्रेड यूनियने एक साथ हैं। हम महंगाई, छंटनी, कम मजदूरी भुगतान, गरीबी और सरकार की आर्थिक नीतियों के खिलाफ एक दिन की हड़ताल पर जा रहे हैं।ÓÓ
उन्होंने कहा, '' देश में कर्मचारियों की यह अब तक की सबसे बड़ी हड़ताल होगी।ÓÓ उल्लेखनीय है कि इससे पहले, 5 जुलाई को प्रमुख विपक्षी दलों द्वारा पेट्रोल एवं डीजल की कीमतें बढ़ाए जाने के खिलाफ हड़ताल की गई जिससे देश में आम जनजीवन अस्त व्यस्त हो गया था।

भारतीय मजदूर संघ को नहीं फरक
नई दिल्ली 15 जुलाई
भारतीय मजदूर संघ ने आज कहा कि उसने केन्द्रीय ट्रेड यूनियनों की बैठक का बहिष्कार किया है और 7 सितंबर को देशव्यापी हड़ताल के आह्वान से अपने को अलग रखने का निर्णय किया है क्योंकि हड़ताल की तिथि तय करने पर कोई पारस्परिक सहमति नहीं बनी।
बीएमएस ने हालांकि साफ किया कि वह भी सरकार की आर्थिक नीतियों का विरोध करता है और उसने 25 अगस्त से देशभर में बड़े स्तर पर धरना प्रदर्शन आयोजित करने की योजना बनाई है।
बीएमएस के अध्यक्ष गिरीश अवस्थी ने एक संवाददाता सम्मेलन में कहा, 'हम बैठक में शामिल नहीं हुए और हमने 7 सितंबर की हड़ताल में शामिल नहीं होने का निर्णय किया है।Ó
उन्होंने कहा, 'एआईटीयूसी के महासचिव गुरुदास दासगुप्ता एवं संयुक्त मंच के अन्य ट्रेड यूनियन नेताओं ने हड़ताल की तिथि बदलने का हमारा अनुरोध स्वीकार करने से इनकार कर दिया।Ó
उन्होंने कहा कि कर्नाटक में भारतीय मजदूर संघ के सदस्यों की 4 सितंबर से एक तीन दिवसीय बैठक होनी है इसलिए हमने हड़ताल की तिथि आगे बढ़ाकर नवंबर में किसी समय रखने का अनुरोध किया था।

इस्पात संयंत्र में जहरीली गैस के सम्पर्क में आने से 27 मजदूर बीमार

कोलकाता, 15 जुलाई
देश में छोटी मोटी औद्योगिक दुर्घटनाओं का जैसे सिलसिला चल पड़ा है। अभी मुंबई में गैस लीक की खबर को एक दिन भी नहीं बीता कि कोलकाता के एक इस्पात संयंत्र में गैस लीक ने ढाई दर्जन मजदूरों को अपनी चपेट में ले लिया। देश के औद्योगिक क्षेत्र में जिस तरह से सुरक्षा मानकों की अनदेखी की जा रही है उससे लगता है कि भारत जल्द ही चीन को पछाड़ देगा जहां औद्योगिक दुर्घटनाएं आए दिन हो रही हैं। ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने की मैनेजमेंट की हवश का मजदूर शिकार हो रहे हैं। मजदूरों के खतरनाक जगहों पर काम करने के दौरान जरूरी सुरक्षा उपकरण तक नहीं मुहैया कराए जाते जिससे हादसे होते रहते हैं।
जानकारी के मुताबिक पश्चिम बंगाल स्थित दुर्गापुर इस्पात संयंत्र (डीएसपी) की भट्ठी से आज सुबह निकली कार्बन मोनोक्साइड और मीथेन गैस के सम्पर्क में आ जाने से कम से कम 27 मजदूर बीमार हो गए।
डीएसपी के संचार प्रमुख बी. कानूनगो ने बताया कि बीमार मजदूरों में से 24 को डीएसपी अस्पताल में भर्ती कराया गया है जहां चार की हालत नाजुक बताई जाती है। उन्हें आईसीयू में रखा गया है।
मामले को गैस लीक की घटना होने से इनकार करते हुए कानूनगो ने कहा कि ''गैसों के बढ़ते संकेंद्रणÓÓ की वजह से मजदूर खुद को भट्ठी के पास असहज महसूस कर रहे थे। जबकि मजदूरों ने गैस लीक होने के कारण बेहोश होने और मितली आने की बात कही है। उनमें कई की हालत खराब है।

कब बात होगी देश में औद्योगिक सुरक्षा मानकों की





मुंबई में गैस लीक के बाद कड़े कानून पर विचार
मुंबई, 15 जुलाई


मुंबई में बुधवार (14जुलाई) सुबह क्लोरीन गैस लीक होने से औद्योगिक इलाकों में सुरक्षा मानकों की धज्जियां उड़ाए जाने की घटना सामने आ गई है। देश में हर महीने गैस रिसाव के कारण मजदूरों और आस पास के लोगों के बीमार होने या उनकी मौत होने की खबर आती है। लेकिन बुधवार को देश की आर्थिक राजधानी में जब यह घटना हुई तो सरकार का इस पर ध्यान गया और इसके खिलाफ कड़े कानून बनाए जाने का विचार होने लगा है। लेकिन लाखों मजदूर जिन असुरक्षित परिस्थितियों में काम करने पर मजबूर हैं उनपर सरकार कोई ध्यान नहीं देने जा रही है।
जानकारी के मुताबिक महाराष्ट्र सरकार घातक पदार्थो के रखरखाव और उनसे होने वाले नुकसान से निपटने के लिए कड़े कानून बनाने पर विचार कर रही है।
दक्षिण-मध्य मुंबई में हुई गैस रिसाव की इस घटना से 100 से अधिक लोग प्रभावित हुए थे। यहां तक कि घटनास्थल पर स्थिति संभालने पहुंचे दमकल विभाग के कर्मचारी भी गैस के प्रभाव से बच नहीं सके क्योंकि वहां भी सुरक्षा के मानक नहीं लागू होते हैं, उनके पास उचित मास्क नहीं थे। मुंबई पोर्ट ट्रस्ट (एमपीटी) के अधिकार क्षेत्र में आने वाले स्क्रैप यार्ड में 141 सिलेंडर 1997 से ही लावारिस पड़े हैं। इन्हीं में से एक में बुधवार को रिसाव हुआ। कस्टम विभाग द्वारा किसी समय पकड़े गए इन सिलेंडरों की मिल्कियत के बारे में अब एमपीटी के अधिकारी भी नहीं जानते।
उद्योगों में काम आने वाले इस प्रकार के आयातित पदार्थ अक्सर मुंबई के बंदरगाहों पर उतरते रहते हैं। लेकिन, राज्य सरकार के अधिकारी यह भी मानते हैं कि मुंबई पोर्ट ट्रस्ट के हाथ से निकलने के बाद जिन औद्योगिक इकाइयों में ऐसे खतरनाक पदार्थो का उपयोग होता है, वहां भी इनसे सुरक्षा के बहुत पुख्ता उपाय फिलहाल मौजूद नहीं हैं।

Wednesday, July 14, 2010

जिन्दल कारखाने में हादसे में दो मरे, एक घायल

रायगढ, 14 जुलाई
रायगढ स्थित जिन्दल स्टील एवं पावर लिमिटेड के पतरापाली संयंत्र में आज एक दुर्घटना में दो लोगों की मौत हो गई जबकि एक अन्य गंभीर रूप से घायल हो गया।
पुलिस अधीक्षक राहुल शर्मा ने यहां बताया कि कारखाने के आक्सीजन प्लांट में शाम पांच बजे के आसपास सिलिंडर में विस्फोट हो गया जिससे एक चार्ज मैन और एक मजदूर की मृत्यु हो गई जबकि एक अन्य गंभीर रूप से घायल हो गया। उसे अस्पताल में भर्ती किया गया है। पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।

Monday, July 12, 2010

अवैध खनन में तीन मजदूरों की मौत

चित्रदुर्ग, (कर्नाटक) 12 जुलाई
होसादुर्ग के जेनाकल में स्थित लोह अयस्क की अवैध खननन में विस्फोटक पदार्थ में धमाका हो जाने से ३ मजदूरों की मौत हो गई जबकि तीन अन्य घायल हो गए।
उपायुक्त अमलान आदित्य बिस्वास ने पत्रकारों से कहा कि यहां से करीब 45 किमी दूर हुए इस हादसे में घायल हुए लोगों को अस्पताल में भर्ती कराया गया है।
उन्होंने कहा कि अवैध खनन करने वालों के खिलाफ मामला दर्ज कराया गया है।
उल्लेखनीय है कि अवैध खनन में विस्फोट से हर साल देश में सैकड़ों मजदूर मारे जाते हैं। विश्व की सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था वाले चीन में तो स्थित और भी बुरी है।

सुरंग में फंसे मजदूरों के जिंदा होने की उम्मीद
बीजिंग, 12 जुलाई

दक्षिण पश्चिमी चीन में एक निर्माणाधीन रेलवे सुरंग के ढह जाने के कारण उसमें दबे १० खनिकों के जिंदा होने की उम्मीद है। राहतकर्मियों को उनकी आवाजें सुनाई दी हैं।
राहत मुख्यालय से जुड़े एक अधिकारी सुन जुन ने बताया कि गुआंग्शी झुआंग स्वात्त क्षेत्र में बिनयांग काउंटी में निर्माणाधीन एक सुरंग का 40-50 मीटर का हिस्सा कल ढह गया और वहां काम कर रहे दस मजदूर उसमें फंस गए।
अधिकारी ने बताया'' स्थानीय समायानुसार सोमवार को सुबह दस बजे खनिकों द्वारा खटखटाने की आवाज सुनी गई थी।ÓÓ

कार्बाइड कचरा डंप करने पर झुकी मध्यप्रदेश सरकार

'वैज्ञानिक राय के बगैर नहीं जलेगा पीथमपुर में यूनियन कार्बाइड का कचराÓ
इंदौर, 12 जुलाई
आखिर मध्यप्रदेश सरकार को झुकना ही पड़ा। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सोमवार को भरोसा दिलाया कि भोपाल गैस त्रासदी के लिए जिम्मेदार यूनियन कार्बाइड फैक्टरी के जहरीले कचरे को पीथमपुर के औद्योगिक कचरा निपटान संयंत्र में वैज्ञानिक राय के बगैर नहीं जलाया जाएगा।
चौहान ने कहा, 'यूनियन कार्बाइड के कचरे को पीथमपुर में वैज्ञानिक राय के बगैर नहीं जलाया जाएगा, क्योंकि यह सीधे जनता से जुड़ा मामला है।Ó
पीथमपुर औद्योगिक क्षेत्र स्थित औद्योगिक कचरा निपटान संयंत्र के पास तारपुरा नाम का गांव बसा है। गांववाले और कुछ गैर सरकारी संगठन यूनियन कार्बाइड फैक्टरी के जहरीले कचरे को इस संयंत्र के भस्मक मे जलाने की योजना का विरोध कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें डर है कि इससे इंसानी आबादी और आबो..हवा पर खतरनाक असर पड़ेगा।

Sunday, July 11, 2010

बहरीन हादसे में मारा गया भारतीय चालक

दुबई, 11 जुलाई
बहरीन के प्रमुख राजमार्ग पर एक के्रन के पलट जाने से इसके भारतीय चालक की मौत हो गई।
स्थानीय समाचार गल्फ डेली न्यूज में छपी खबर के अनुसार कल माधवन सुदर्शनन :51: जब मोबाइल के्रन चला रहा था तो वाहन अवरोधक से टकराने के बाद पलट गया।
वह हिद्द में मनामा से खलीफा बिन सलमान राजमार्ग पर जा रहा था। नागरिक रक्षा दलों को वाहन का क्षतिग्रस्त ढांचा काटकर उसका शव निकालना पड़ा।
केरल के तिरूवनंतपुरम का रहने वाला सुदर्शनन पिछले 13 साल से डेल्मन प्रीकास्ट कंपनी के लिए वाहन चालक का काम करता था। भारत में उसके परिवार में पत्नी और दो बच्चे हैं।
खबर के अनुसार कंपनी उसके शव को भारत भिजवाने का प्रबंध कर रही है।
कंपनी के महाप्रबंधक जान मोतराम ने कहा, ''हम यातायात रिपोर्ट का इंतजार कर रहे हैं ताकि पता चल सके कि दुर्घटना कैसे हुई।ÓÓ

पर्यावरण मंत्री को भी नहीं पता कैसे रातों-रात दफना दिया गया कार्बाइड का कचरा


तारपुरावासियों को डरा रहा है यूनियन कार्बाइड का कचरा
रमेश को घेरा गांववासियों ने, दिखाए जख्म
हर्षवर्धन प्रकाश, इंदौर, 11 जुलाई


मध्यप्रदेश के पीथमपुर औद्योगिक क्षेत्र में करीब 1500 की आबादी वाले एक गुमनाम से गांव तारपुरा के निवासियों को भोपाल गैस त्रासदी के लिए जिम्मेदार यूनियन कार्बाइड फैक्टरी का जहरीला कचरा डरा रहा है। शनिवार को तारपुरा पहुंचे केंद्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने कहा, 'मुझे पता नहीं है कि पीथमपुर में यूनियन कार्बाइड का कचरा दो साल पहले हड़बड़ी में रातों-रात क्यों दफना दिया गया। मैं भरोसा दिलाता हूं कि आगे ऐसा नहीं होगा।Ó
दिसंबर 1983 में विश्व की भीषणतम औद्योगिक त्रासदी के बाद से बंद पड़े कारखाने के करीब 40 टन ठोस अपशिष्ट को करीब दो साल पहले तारपुरा से करीब 500 मीटर दूर एक घातक कचरा निपटान संयंत्र में गोपनीय ढंग से दफना दिया गया था। गांववासियों की शिकायत है कि इसके बाद नजदीकी जलस्त्रोत प्रदूषित हो गए।
अब यूनियन कार्बाइड के करीब 350 टन जहरीले कचरे को इसी संयंत्र में भस्म करने की योजना कागजों पर है, जिससे आशंकित गांववालों ने सड़क पर उतरकर मोर्चा खोल दिया है।
इंदौर से कोई 30 किलोमीटर दूर तारपुरा में 8 जुलाई को भीड़ ने उन दो वाहनों को रोककर नुकसान पहुंचाया, जो इस संयंत्र में एक टेक्सटाइल फैक्टरी का कचरा ले जा रहे थे।
इसके दो दिन बाद यानी 10 जुलाई को केंद्रीय वन और पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश को गांववालों के जबर्दस्त विरोध का सामना करना पड़ा, जब वह पीथमपुर स्थित घातक अपशिष्ट निपटान संयंत्र का निरीक्षण करने पहुंचे।
तख्तियां थामे गांववालों ने रमेश को घेर लिया और उनसे इस संयंत्र को बंद करने की मांग करने लगे। इनमें बड़ी संख्या में महिलाएं भी थीं।
नाराज भीड़ के सवालों से घिरे रमेश ने प्रदर्शनकारियों को भरोसा दिलाया कि आबो-हवा और इंसानी आबादी की सुरक्षा सुनिश्चित किए बगैर यूनियन कार्बाइड के कचरे का निपटारा नहीं किया जाएगा। उन्होंने साफ किया कि यूनियन कार्बाइड के कचरे को पीथमपुर के घातक कचरा निपटान संयंत्र में जलाने को लेकर अभी अंतिम फैसला नहीं हुआ है।
बहरहाल, खुद वन और पर्यावरण मंत्री भी मानते हैं कि एक आबाद गांव के पास घातक कचरे का निपटारा करने वाले संयंत्र का संचालन 'चिंता का विषयÓ है और इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि यूनियन कार्बाइड के कचरे का निपटारा केंद्र और राज्य सरकार के आपसी तालमेल और पारदर्शी ढंग से किया जाएगा। इससे पहले स्थानीय आबादी को भरोसे में लिया जाएगा।

मंदी से उबर गए उद्योग, सस्ती मजदूरी से बढ़ा रहे मुनाफा

पहली तिमाही में इंंदौर सेज से निर्यात 220 फीसद बढ़ा
इंदौर, 11 जुलाई


इंदौर के पास पीथमपुर में स्थित विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज) से निर्यात मौजूदा वित्त वर्ष की पहली तिमाही में लगभग 220 फीसद बढ़ा और 276 करोड़ रुपए हो गया जिसे वैश्विक मांग में उछाल का संकेत माना जा सकता है। लेकिन यहां मजदूरों की तनख्वाहें मंदी के दौर की ही हैं। मजदूर में एका न होने से और कोई एक सशक्त यूनियन न होने से उनकी मजदूरी वहीं की वहीं है।
देश के इस अकेले ग्रीनफील्ड बहुउत्पादीय सेज से पिछले साल की समान अवधि में महज 86 करोड़ रुपए का निर्यात किया गया था, जब दुनिया की अर्थव्यवस्थाएं आर्थिक मंदी की चपेट में थीं।
इंदौर सेज के विकास आयुक्त एके राठौर ने बताया, 'आंकड़े साफ कह रहे हैं कि निर्यात क्षेत्र मंदी के दौर से तेजी से उबरा है। वित्तीय वर्ष 2009..10 में इंदौर सेज से निर्यात करीब 15 फीसद बढ़कर 494 करोड़ रुपए हो गया था। मौजूदा वित्तीय वर्ष की शुरूआत में निर्यात केे रुझान शानदार हैं।Ó
उन्होंने कहा कि वित्त वर्ष 2010..11 के पहले तीन महीनों मे इंदौर सेज से हुए कुल कारोबार में भी पिछले साल के मुकाबले 200 फीसद का इजाफा हुआ और यह 387 करोड़ रुपए हो गया।
राठौर ने बताया कि 1100 हेक्टेेयर में फैले इंदौर सेज में अलग..अलग औद्योगिक परियोजनाओं मे 30 जून तक कुल 2,125 करोड़ रुपए का निवेश किया जा चुका है।
इंदौर सेज में फिलहाल इंजीनियरिंग, फार्मा, वस्त्र निर्माण और खाद्य प्रसंस्करण समेत अलग..अलग क्षेत्रों की 25 औद्योगिक इकाइयां चल रही हैं, वहीं 10 अन्य इकाइयों के निर्माण का काम जारी है। सेज 10,000 से ज्यादा लोगों को रोजगार दे रहा है।

Saturday, July 10, 2010

छह दिन बाद नेवेली लिग्नाइट के कर्मचारी काम पर लौटे




नेवेली, 6 जुलाई
तमिलनाडु स्थित सार्वजनिक क्षेत्र की बिजली उत्पादन की अग्रणी कंपनी नेवेली लिग्नाइट कारपोरेशन (एनएलसी)के कर्मचारियों ने अनिश्चितकालीन हड़ताल मंगलवार को समाप्त कर दी। कंपनी के करीब 14,000 कर्मचारी वेतन और अन्य मांग को लेकर पिछले छह दिनों से अनिश्चितकालीन हड़ताल पर थे।
कंपनी के सूत्रों ने बताया कि सोमवार आधी रात से हड़ताल खत्म कर दी गई और कर्मचारी मंगलवार सुबह की पाली में काम पर लौट आए।
1 जुलाई को केंद्रीय संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी ए राजा ने एनएलसी में चल रही हड़ताल को खत्म करने के लिए कोयला मंत्रालय से हस्तक्षेप करने की मांग की है।
सरकारी बिजली उत्पादक कंपनी के दो ट्रेड यूनियनों से जुड़े कर्मचारी अनिश्चितकालीन हड़ताल पर चले गए थे। कंपनी कर्मियों के वेतन मानों जनवरी, 2007 से संशोधन नहीं हुआ है। केंद्रीय कोयला राज्य मंत्री श्रीप्रकाश जयसवाल को लिखे पत्र में उन्होंने कहा है कि प्रबंधन ने फिटमेंट के समय 25 फीसद वेतन लाभ पर सहमति जताई थी जिसे एक जनवरी, 2007 से प्रभावी होना था, लेकिन बाद की बातचीत में वह मुकर गया और कहा कि वह एक सितंबर, 2009 से सिर्फ नौ महीने का ही वेतन लाभ दिया जा सकता है।
तमिलनाडु की एनएलसी की दो प्रमुख कर्मचारी यूनियनों ने वेतन में सुधार के मामले पर वार्ता विफल होने के बाद बुधवार रात से हड़ताल पर जाने की घोषणा की। किसी भी प्रकार की हिंसा रोकने के लिए कंपनी की खानों, बिजली संयंत्र और कार्पोरेट कार्यालय के बाहर करीब 2,000 पुलिसकर्मी तैनात किए गए हैं।
एनएलसी प्रबंधन ने राज्य सरकार से कहा है कि हड़ताल होने पर बिजली आपूर्ति बाधित हो सकती है। पीएमके और सत्तारूढ़ डीएमके से जुड़ी यूनियनें 14,000 स्थाई कर्मचारियों के बहुमत का प्रतिनिधित्व करती हैं। प्रबंधन और कर्मचारियों के बीच विवाद की प्रमुख वजह वेतन वृद्धि की तिथि को लेकर है। एक कर्मचारी नेता ने नेवेली से टेलीफोन पर कहा, “हम चाहते हैं कि वेतन वृद्धि एक जनवरी 2007 से प्रभावी हो। इस मांग पर प्रबंधन पहले सहमत था। अब प्रबंधन चाहता है कि वेतन वृद्धि एक सितम्बर 2009 से प्रभावी हो।”

इससे पहले गत वर्ष 29 मार्च को नेवेली लिगनाइट कॉर्पोरेशन के हजारों अस्थाई कर्मचारी अनिश्चितकालीन हड़ताल पर चले गए। लगभग 4,335 अस्थायी कर्मचारियों ने 8.33 प्रतिशत बोनस और प्रबंधन द्वारा उनकी यूनियन को मान्यता दिये जाने की मांग को लेकर यह हड़ताल की है। गौरतलब है कि यूनियन के प्रतिनिधियों और कंपनी प्रबंधन के बीच बातचीत का कोई नतीजा नहीं निकलने के बाद इन कर्मचारियों ने हड़ताल पर जाने का फैसला लिया। एनएलसी श्रमिक यूनियन का दावा है कि इस हड़ताल में अन्य कर्मचारी भी हिस्सा लेंगे।

आठ घंटे की मांग पर ग्रेनो में कंपनी गेट पर श्रमिकों का प्रदर्शन

ग्रेटर नोएडा, जुलाई 09
अब एनसीआर (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र का ) का मजदूर वर्ग अपनी अन्य मांगों में काम के घंटे आठ करने की राजनैतिक मांग को शामिल करने लगा है। उल्लेखनीय है कि एनसीआर में लगभग सभी कंपनियां कर्मचारियों से 12 घंटे काम कराती हैं। और यह लगभग सभी मजदूरों-कर्मचारियों की मजबूरी बन गई है।
शुक्रवार को ग्रेटर नोएडा में काम के घंटे कम करने मांग को लेकर कासना स्थित मैसर्स अंजनी टेक्नोप्लास्ट कंपनी के कर्मचारियों ने प्रदर्शन किया। कर्मचारियों ने कंपनी प्रबंधकों से उत्पीड़न बंद करने व उनकी मांगों को पूरा करने की मांग की। मांग के समर्थन में कर्मचारियों ने कंपनी प्रबंधकों को ज्ञापन सौंपा। कर्मचारियों का आरोप है कि उन्हें काम के पैसों का भुगतान समय पर नहीं किया जाता। कई बार तो दो से तीन महीने का भुगतान एक साथ किया जाता है। इससे परेशानियों का सामना करना पड़ता है। कर्मचारियों से बारह से चौदह घंटे काम लिया जाता है, जो नियमानुसार गलत है। उनके द्वारा अधिक समय तक किए गए कार्य का भुगतान भी नहीं किया जाता। कर्मचारियों का आरोप है कि कैंटीन में भोजन करने की एवज में वेतन से आठ सौ रुपये काटे जाते थे। पिछले काफी समय से कैंटीन बंद चल रही है, लेकिन वेतन की कटौती पूर्व की भांति हो रही है। कर्मचारियों का कहना है कि यदि उनकी मांगों को पूरा नहीं किया गया तो प्रदर्शन जारी रहेगा।